साहित्य

मासूम को पटक-पटक मारने से मैं बहुत आहत हुआ

जयचन्द प्रजापति

मासूम को पटक-पचाहे जितना साहित्य लिख डालिये पर समाज में कुछ ऐसे दरिंदे रहते हैं जो दरिंदगी इतना कर जाते हैं जिन पर साहित्य का कोई असर नहीं। मुझे सबसे ज्यादा आहत कर देने वाली फिरोजाबाद की एक घटना जहाँ एक मासूम को पटक-पटक कर मार डाला। बेहद बेदर्दी के साथ पटक- पटक कर मार डाला।

 

इस घटना से मैं इतना आहत सा हो गया कि दो-तीन दिन तक कुछ लिखने का मन नहीं किया। इस कदर वह दरिदा उस मासूम को पटक रहा था। कोई चेहरे पर शिकन नहीं। बिना रुके लगातार पटकता रहा हरामखोर। इतनी तीव्रता के साथ वारदात का अंजाम दिया। उस मासूम को कोई बचाने के लिए तक नहीं आ सका।

 

आखिर लोगों को इतनी गुस्सा क्यों है ? क्यों इतनी जलन है ? एक रास्ता बंद है तो दूसरे रास्ते से भी जा सकते हैं। क्यों जिद है कि नहीं इसी रास्ते से चलकर मंजिल प्राप्त कर लेंगे। आखिर उस मासूम को मारकर क्या मिला? जिसकी कल्पना नहीं की थी। वही मिल गया।

 

समाज में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये तो जो उससे कमजोर हैं। उसके प्रति गुस्सा है, नफरत है। एक मानसिक चिढ़ है कि वह हमारी बात क्यों नहीं मान रहा है। उसे कमजोर समझते हुए कुछ इस तरह से वारदात का अंजाम दिया जाता है कि वह बेहद दुखद घटना बन जाती है।

 

हम उन लोगों से अपील करते हैं जो शायद एक गलत कार्य का अंजाम देने जा रहे हैं। अंजाम देने से पहले उसके होने वाले परिणामों पर जरुर एक बार अध्ययन करें तथा शांत मन बनाने की कोशिश करें।

 

एक गलत कदम से आप खाईं में गिर सकते हैं। इस दुनिया से आप कुछ भी लेकर नहीं जा सकते हैं। अगर किसी के प्रति गुस्सा, नफरत की आग सुलग रही है तो प्रेम की शीतलता से आग की लौ को कम किया जा सकता है।

 

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जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

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