
अवसर दिया होता कभी,
कब का उसे पहचानता।।
कितना तुझे है चाहता,
यह राज़ भी तू जानता।।
उसकी हँसी पर तू गया,
विश्वास उसपर कर लिया,
जब साथ चाहा आज तो,
नज़रे चुराये चल दिया।।
यह रंग है इन्सान का,
कैसे कभी जाना नहीं।
अब देर कर दी है बहुत,
फल भूल का पाना यहीं।।
कहना सुना होता अगर,
सुख-चैन से कटता सफ़र।
तेरा व़हम अब कोसता,
कहता हुआ सूना शहर।।
जब तक दिया तो नाम था,
ऊँचा तुम्हारा स्थान था।
कैसे तुझे भी दोष दे,
तू सत्य से अन्जान था।।
अफ़सोस से अब क्या मिले,
ये भाग्य के हैं सिलसिले।
तू गीत वो बेसाज़ है,
फीकी जहाँ आवाज़ है।।
जो भी हुआ तेरे साथ में,
कोई नहीं किस्सा नया।
है दर्द देते जो यहाँ,
उसमें कहाँ होती दया।।
चल हौसला भर ले जिगर,
कर शौक से तय तू डगर।
जो हो गया सो हो गया,
चल दूर रख उससे नज़र।।
(गोवर्धनसिंह फ़ौदार ‘सच्चिदानन्द’)
पता :मोरिश्यस।




