कभी – नारी होती थी पूज्यनीय-बचपन से बुढ़ापा तक किन्तु – आज की-नारी- है लाचार रोज पढ़ो और सुनो -नारी-उठती…
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कभी – नारी होती थी पूज्यनीय-बचपन से बुढ़ापा तक किन्तु – आज की-नारी- है लाचार रोज पढ़ो और सुनो -नारी-उठती…
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कभी – नारी होती थी पूज्यनीय-बचपन से बुढ़ापा तक किन्तु – आज की-नारी- है लाचार रोज पढ़ो और सुनो -नारी-उठती बीच बाजार- और होती इज्जत तार तार कहीं पर फेकते-तेज़ाब- मुँह पर तो- कहीं पर करते सीमा पार फिर देते…
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कभी – नारी होती थी पूज्यनीय-बचपन से बुढ़ापा तक किन्तु – आज की-नारी- है लाचार…
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कभी – नारी होती थी पूज्यनीय-बचपन से बुढ़ापा तक किन्तु – आज की-नारी- है लाचार रोज पढ़ो और सुनो -नारी-उठती…
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मुस्कुराती हो तुम झूम उठता मेरा दिल नीले बादलों में खुली घटाओं में सिर्फ लगता हैं शायद तुम मुस्कुरा रही…
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हँसी तुम्हारे चेहरे पर, जैसे है सुबह की उजली धूप, जो भर देती है दामन मेरा-, खुशियों से- उमंगों से-…
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साहित्य के गगनांगन में एक दैदीप्यमान नक्षत्र जिसने साहित्य को आलोकित कर ज्ञान की किरणों को पाठकों के बीच पहुँचाया।…
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