साहित्य

बनाकर पगडंडी ऐसे

कनक

बनाकर पगडंडी ऐसे अब हाथों में साहिल आ जाए
भूलाकर ज़ख्मों को अब तो ख़ुद ही हंसना दिल आ जाए।।

मुमकिन नहीं जीना तेरे बग़ैर इस दुनियां में बिन यार
बस यही है तमन्ना दिल की अब तक़दीर मंज़िल आ जाए।।

लाऊं कहां से तक़दीर ऐसी पांवों की पायल घर आए
जिन्दगी निकले भंवर से बाहर कोई काबिल आ जाए।।

मौसम अलबेला हैं चारों तरफ दिल अकेला है मेरा
ऐसी हसीन रात आए कि जाने ख़ुद काबिल आ जाए।।

सपनों में खोता राही तूफानों से लड़ता रहता हूं
ख्वाबों में आती मंज़िल दूरी है अब मुश्किल आ जाए।।

कनक

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