
दिल साफ़ था मेरा, ज़ुबान कड़वी रही,
जो कहा दिल से कहा, कोई समझ पाया नहीं, सच बोला तो लगा जैसे कोई गुनाह सही।
दिल दिल साफ था मेरा जुबान कड़वी रही।
मैंने आईना दिखाया तो नज़रें फेर लीं,
झूठ को अपना समझा सच्चाई ठुकरा दी गई।मेरी खामोशी में भी शोर बहुत था छुपा,पर शोर सुनने की फुर्सत किसी को रही नहीं।
मैं गलत नहीं थी, थोड़ी अलग सी थी,
भीड़ की चाल से मेरा कदम मेल खाता नहीं,बस गलत बात दिल मेरा सहता नहीं।
दिल में नफरत नहीं, बस दर्द पलता रहा,मेरे अपनों को अपना छलता रहा,
भोला बन वो काम करता रहा…
कोई समझता नहीं वो छलिया बड़ा।
पर दर्द की भाषा कोई पढ़ पाता नहीं।
कड़वी ज़ुबान का अब मलाल नहीं।
जो समझ गया था मुझे, मेरा अपना बन गया,बाकी दुनिया की मुझे परवाह नहीं..स्वार्थ के आगे कोई सुनवा नहीं।
दिल साफ था मेरा जुबान कड़वी रही।।
सीता सर्वेश त्रिवेदी जलालाबाद शाहजहांपुर




