आलेख

दिसंबर की अंतिम सप्ताह और मेरे पत्रकार साथियों के लिए चिंता व मार्गदर्शन

कुमुद रंजन सिंह

दिसंबर का अंतिम सप्ताह आत्ममंथन का समय होता है। यह वह क्षण है जब एक पत्रकार पीछे मुड़कर अपने कार्य, अपने संघर्ष और अपने सिद्धांतों को देखता है। किंतु आज की पत्रकारिता के सामने जो सबसे बड़ी चिंता खड़ी है, वह केवल आर्थिक या तकनीकी नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप की है—जहां कुछ तथाकथित गांधीवादी या वैचारिक समूह पत्रकारों को अपने अनुसार “ढालने” का प्रयास कर रहे हैं।

हाल ही में बिहार के बोधगया में आयोजित आचार्य कुल सम्मेलन में जो दृश्य देखने को मिला, वह न केवल चिंताजनक था, बल्कि पत्रकारिता और बिहार की सांस्कृतिक गरिमा—दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला रहा। सम्मेलन में आचार्य कुल के अध्यक्ष आचार्य धर्मेन्द्र द्वारा पत्रकारों को “बदलने” की सलाह दी गई। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पत्रकारों का कार्य किसी संस्था या व्यक्ति की विचारधारा के अनुसार ढल जाना है, या फिर समाज के सामने सच को उसी रूप में रखना, जैसा वह है?

इस सम्मेलन में विभिन्न देशों से आए प्रवासी भारतीयों को बिहार की धरती पर आमंत्रित किया गया, किंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि उन्हें बिहार की ऐतिहासिक आतिथ्य संस्कृति से परिचित कराने के बजाय छल, कपट और भिक्षाटन जैसी छवि प्रस्तुत की गई। न तो मूलभूत सुविधाओं का ध्यान रखा गया, न ही शुद्ध पेयजल जैसी अनिवार्य व्यवस्था की गई। भोजन के नाम पर आलू और सस्ते गल्ले की दुकान का मोटा चावल परोस कर बिहार की समृद्ध संस्कृति का मज़ाक उड़ाया गया।

यह वही बिहार है, जिसकी मिट्टी से मोहनदास करमचंद गांधी को देशव्यापी पहचान और जनसमर्थन मिला। यही वह बिहार है, जहां से आचार्य विनोबा भावे को भूदान आंदोलन के लिए सबसे अधिक भूमि ही नहीं, बल्कि आतिथ्य, संवेदना और त्याग का गहन अनुभव प्राप्त हुआ। उसी विनोबा के नाम पर, उसी गांधीवादी परंपरा की आड़ में, बिहार को बदनाम किया जाना न केवल ऐतिहासिक अन्याय है, बल्कि वैचारिक पाखंड भी है।

आचार्य कुल के नाम पर जो हुआ, वह शिक्षा, संस्कृति या नैतिकता का विस्तार नहीं, बल्कि बंदरबांट और बदनामी का उदाहरण बनकर रह गया। इससे पत्रकारों के सामने यह चुनौती और गहरी हो जाती है कि वे सत्ता, संगठन या विचारधारा के दबाव में आकर सच से समझौता न करें।

मेरे पत्रकार साथियों के लिए इस अंतिम सप्ताह में यही मार्गदर्शन है कि— पत्रकारिता को किसी के “अनुकूल” बनने की आवश्यकता नहीं है।
पत्रकारिता का धर्म सवाल पूछना है, असुविधाजनक सच सामने लाना है, और समाज के आईने के रूप में खड़े रहना है।

यदि आज हम चुप रहे, यदि आज हमने अपनी स्वतंत्रता किसी विचारधारा के चरणों में रख दी, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ़ नहीं करेंगी। दिसंबर की ठंड में कलम को ठंडा नहीं पड़ने देना है। सच, संवेदना और साहस—यही पत्रकारिता की असली पहचान है, और यही हमारा मार्ग भी।

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