साहित्य

दिसम्बर आ गया

नरेश चन्द्र उनियाल

“दिसम्बर आ गया”

हो गई ठिठुरन सुबह और शाम को,
कंपकंपाता शीत है, तन-जान को,
ओस पड़ती और कोहरा छा गया,
है दिसम्बर का महीना आ गया।

मूंगफली – ठेले सजे बाजार में,
गजक गुड़पट्टी सजी बाजार में,
‘चाय की चुस्की’ का आलम आ गया,
है दिसम्बर का महीना आ गया।

खेत में सरसों की छाई पीलिमा,
हरित गेहूं से धरा, नभ नीलिमा,
अवनि तल पर है कुहासा छा गया,
है दिसम्बर का महीना आ गया।

धूप सेकें बैठ छत, हर एक जन,
मुस्कराते उनके चेहरे मुदित मन,
खिलखिलाने का मुहूरत आ गया,
है दिसम्बर का महीना आ गया।

✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढवाल, उत्तराखण्ड।

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