साहित्य

गीता का सार

सौ, भावना मोहन विधानी

पृथक हो चुकी हूं मैं जीवन के सारे दुख सुख से,
हे माधव जब से सुना है गीता का ज्ञान तुम्हारे मुख से।
जीवन को अब कैसे जीना है यह तुमने सिखाया है,
अपने जीवन के सारे प्रश्नों का उत्तर मैंने गीता में ही पाया है।

कर्म करो फल की इच्छा मत करो यह अब मैं जान गई हूं,
कैसी भक्ति से मिलते हैं माधव अब यह पहचान गई हूं।
कर्म ही हमारे जीवन में लाते मोक्ष की कसौटी है,
कर्म अगर सच्चे हो तो जीवन की हर मुसीबत छोटी है।

अपना पराया और जाति भेद से बहुत ऊपर उठ जाओ तुम,
सारी वसुंधरा एक परिवार है सबको प्यार से गले लगाओ तुम।
क्षणभंगुर है यह जीवन हमारा मृत्यु ही सच्चाई है,
क्या सही और क्या गलत यह गीता के श्लोक ने बात समझाई है।

जीवन के हर क्षण में हे माधव मैं करती रहूं बस तेरी साधना,
तेरे चरणों में स्थान मिल जाए जीवन में फिर कोई और न कामना।
तेरे गीता ज्ञान को मैं रोज सबको हर पल सुनाती रहूं,
क्या है गीता का सार सारे जग को यह बतलाती रहूं।

सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र

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