
जमाने में उठाते हैं,फायदा सब शराफत का
कहें क्या दास्ताँ यारों, नशीले दिल नजाकत का ।
चढ़ा है रंग उन पर भी, जमाने की रवायत का,
बसी है साजिशें दिल में, मुखौटा है शराफत का॥
तमाशे करता है कितने,नहीं यह दिल समझता है,
नहीं इस पर असर कोई,है अपनों की हिदायत का॥
लगी है होड़ कैसी ये, सभी को आगे बढ़ाने की,
गिरा सबको बढ़े आगे,यही है ढंग सियासत का॥
बड़ा मजबूर है इंसा, नहीं है हाथ में कुछ भी,
लिखा है क्या लकीरों में,क्या है यह खेल किस्मत का॥
बने वो ही रक़ीब हैं, कि जिनके साए में बैठे,
न जाने किसका है जिम्मा, बेटियों की हिफाजत का॥
विनीता चौरासिया शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश




