१ एक सामान्य व्यक्ति भी अपनी प्रतिभा योग्यता और क्षमता का परिचय देकर विश्व को शान्ति सौहार्द्र का सन्देश देते हुए अपने राष्ट्र की सेवा कर सकता है। यह सिद्ध करके दिखाया है भारत रत्न से सम्मानित पत्रकारिता जगत के ख्यातिप्राप्त हस्ताक्षर, कुशल , ओजस्वी और मेधावी वक्ता, राजनीतिज्ञ और कवि हृदय के स्वामी, सरस्वती के पुत्र तथा भारतीय जनता में लोकप्रिय रहे युवा शक्ति के प्रेरणा स्रोत अटल बिहारी वाजपेई ने ।
२ एक सामान्य शिक्षक परिवार में 25 दिसम्बर 1924 को जन्मे इस बालक की जन्मजात प्रतिभा को संघ शाखाओं ने पहचाना, गढ़ा, उनकी वाकपटुता और वैचारिक शक्ति को नया आयाम दिया और फिर राजनीति की उन गलियों में उतार दिया जिसके बारे में उन्होने रपटीली राहें का प्रयोग किया था। उनकी जीवनगाथा एक स्वयं सेवक से प्रारम्भ होकर भारत के चुने हुए सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता प्रधानमंत्री के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
३ स्वतंत्र भारत में जिन लोगों ने पत्रकारिता की,राजनीति की और जनमानस में विशिष्ट स्थान बनाया उनमें अटल जी का नाम हमेशा ही सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा। वे अपने कार्य से तथा अपने भाषणों से भी सदैव देश हित की बात करते रहे, समाज को दिशा देते रहे । इसी कारण उन्हें युवा हृदय सम्राट कहा जाता था।
४ किसी भी समाज में युवा शक्ति को जागृत करते हुए उसे देश प्रेम के भाव से ओतप्रोत करते हुए राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करना महत्वपूर्ण होता है। अटल जी इसे जानते, पहचानते थे, इसीलिए उन्होंने अपने विचारों से युवा शक्ति को प्रेरणा देने का कार्य किया।
५ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका परिचय हुआ तो संघ की प्रेरणा से उन्होंने राष्ट्र धर्म तथा पाञ्चजन्य का संपादन भी किया। इसके अतिरिक्त दैनिक स्वदेश और तरुण भारत में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दीं। आपातकाल में जब प्रतिबंध लगा तो गिरधर कविराय के नाम से उनकी कुंडलिया प्रकाशित होती रहीं, जिनमें लोकतंत्र, देश प्रेम, मानव बोध के स्वर मिलते हैं। अपने युवाकाल से ही वे मंचों से कविता पाठ करने लगे थे। 1942 में उनकी लिखी कविता ताजमहल की पंक्तियां दृष्टव्य हैं
यह ताजमहल है !
यह ताजमहल!
यमुना की रोती धार विकल कल कल छल छल
जब रोया हिंदुस्तान सकल तब बन पाया ताजमहल
यह ताजमहल!
यह ताजमहल!
६ मुगलकाल में कथित प्रेम के प्रतीक रूप में निर्मित इस इमारत को उन्होंने जिस रूप में देखा, समझा उसकी सहज अभिव्यक्ति इन पंक्तियों में देखी जा सकती है।
७ इसी काल में उनकी कविता ” हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय” लोगों ने सुनी। इस कविता में अनेक शब्द चित्रों के माध्यम से उन्होंने भारत के स्वरुप को, उसकी भावनाओं को, उसकी आत्मा को विश्व के सामने रखा है। भारतीय संस्कृति, प्रवृत्ति और जीवन दर्शन की व्याख्या अत्यंत सहज और सरल तरीके से इस कविता को पढ़ कर समझी जा सकती है।
८ अटल जी मूलतः लेखक, कवि और पत्रकार थे। राजनेता बने तो अपने वक्तव्यों के कारण। लेकिन संसद के भीतर और बाहर ही नहीं भारत के बाहर भी विपक्ष के नेता के रूप में, सरकारी प्रतिनिधि मंडल के सदस्य या नेता के रूप में और फिर विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में भी उन्होंने भारत की जनता की आवाज उठाई। संयुक राष्ट्र संघ में पहली बार हिन्दी में बोले। अपनी भाषा, अपने गौरव, अपनी संस्कृति को प्रतिष्ठित किया।
१८ लम्बी बीमारी से जूझते हुए 16 अगस्त की शाम सूर्यास्त के समय अंधेरों से लड़ता हुआ एक दीप जब बुझा तो लगा मानो गहन निशा ने पूरे भारत को अपने जाल में जकड़ लिया है।
उनके निधन पर सभी पक्ष के लोगों ने उन्हें स्मरण करते हुए जो कहा,वह उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचायक है।
तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा उनका विलक्षण नेतृत्व,दूरदर्शिता, तथा अदभुत भाषण उन्हें एक विशाल व्यक्तित्व प्रदान करते थे। उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने उन्हें आजाद भारत का सबसे बड़ा नेता बताया जिसका शासन व्यवस्था और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। वहीं संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा ” वे हमारे राष्ट्रीय जीवन में विशाल व्यक्तित्व थे, उनके हर कार्य में प्रतिबद्धता परिलक्षित हुई। उनके लिए राष्ट हित सर्वोच्च था, साथ ही वे बड़े हृदय के उदार व्यक्ति भी थे।”
समाज का ऐसा कोई वर्ग नहीं था जिसने उनके निधन पर अपना मनोगत व्यक्त न किया हो।
१८ विभिन्न अवसरों पर उनके भाषणों के अंश इस बात के साक्षी हैं कि वे कितने दूरदर्शी और समर्पित थे। सत्ता के प्रति उनका कहना था, यदि मैं पार्टी तोडूं और सत्ता में आने के लिए नया गठबंधन बनाऊं तो मैं उस सत्ता को छूना भी नहीं पसंद नहीं करूंगा।”
पोखरण २ कोई आत्मश्लाघा के लिए नहीं था, कोई पुरुषार्थ के प्रकटीकरण के लिए नहीं था। लेकिन हमारी नीति है और मैं समझता हूं कि देश की नीति है कि न्यूनतम अवरोध होना चाहिए।
शिक्षा अपने सही अर्थों में स्वयं की खोज है, यह अपनी प्रतिमा गढ़ने की कला है।
बंदूक किसी समस्या का समाधान नहीं है।
आप मित्र तो बदल सकते हैं लेकिन अपने पड़ोसी नहीं।
उनकी वाकपटुता, हाजिर जवाबी और स्पष्टता के कारण ही क्या पक्ष क्या विपक्ष, उन्हें ध्यान से सुनता था।
९ किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। विपक्ष में रहते हुए भी वाजपेयी जी सकारात्मक और रचनात्मक आलोचना के पक्षधर थे। निराधार ,अनर्गल , तथ्यहीन आरोप लगाना उनके न तो स्वभाव में था और नहीं लोकतंत्र के लिए वे इसे हितावह मानते थे। किसी व्यक्ति विशेष में रचनात्मक सकारात्मक दृष्टिकोण तभी होता है जब उसका अध्ययन प्रचुर मात्रा में हो, स्थिति को समझने की क्षमता हो ,विधि विधान और संसदीय प्रणाली का परिचय हो ,जीवन मूल्यों के प्रति आस्था हो ,नैतिक साहस हो और जनकल्याण की भावना भी हो। सत्तालोलुप या सत्ता के लिए संघर्ष का विचार उनके मन में कभी नहीं था । विरोध के लिए विरोध की राजनीति उन्हें कभी नहीं भाई।इसी प्रकार जब वे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने जनहित के विचार करते हुए योजनाएं बनाई और 1999 में जब भी एक मत से अविश्वास प्रस्ताव पर बस के बाद पराजित हुए तो भी विचलित नहीं हुए और ना ही अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को विचलित होने दिया हताशा और निराशा उनके मन में कभी नहीं की सरकार गिरी पर लोकतंत्र जीवित रहा यही कारण है विपक्षी नेताओं ने भी उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की ।उनके हम मन में हमेशा एक ही भाव रहा ।
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं ।
सच तो यही है वे हमेशा नए गीत गाते थे , नई कल्पना नई सोच नए सपने देखते थे और उन्हें साकार करने का प्रयास भी करते थे ।उनके सामने देशहित , राष्ट्रीय हित सर्वप्रथम था।आंतरिक सुख शांति सुरक्षा समृद्धि के साथ ही वे सीमा सुरक्षा के प्रति भी सदैव सचेत रहे । तभी तो पोखरण दो की योजना को मूर्त रूप दे सके और कारगिल पर विजय प्राप्त कर सके । वह कभी असहिष्णु नहीं रहे किंतु गलत को गलत करने का माद्दा उनके अंदर था।
स्वाधीनता आंदोलन में कांग्रेस का महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।किंतु इस काल में हिंदू महासभा तथा मुस्लिम लीग ने राजनीतिक मंच के रूप में अपने को स्थापित करने का प्रयास भी किया था ,हमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है। कांग्रेस उस समय में सभी भारतीयों का एक साझा राजनीतिक मंच था जिसके माध्यम से अलग-अलग विचारों के लोग भी स्वाधीनता आंदोलन को गति दे रहे थे ।कांग्रेस से मतभेद रखते हुए भी कांग्रेस के नेतृत्व में उन्होंने काम किया । 1917 में सोवियत संघ की क्रांति के बाद साम्यवाद का जन्म हुआ और भारत में उससे प्रभावित विचार वालों ने कम्युनिस्ट पार्टी बनाई ।इसी के साथ-साथ एक और संगठन तैयार हो रहा था जो गांधी जी के विचारों से प्रभावित तो था किंतु पूरी तरह समर्थित नहीं था और उसने प्रजा समाजवादी पार्टी बनाकर आंदोलन की शुरुआत की ।
१० भारत की स्वतंत्रता के बाद अनेक विचारको ने अपने-अपने मत अथवा अपने-अपने विचारों को प्रतिपादित करते हुए अलग-अलग संगठन बनाकर चुनाव लड़े ।स्वतंत्र पार्टी ,समाजवादी पार्टी तथा कई छोटे-मोटे दल स्वतंत्रता के बाद प्रथम चुनाव के पूर्व पंजीकृत हुए । इसी कालखंड में 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना कांग्रेस सरकार में रहे वरिष्ठ नेता और राष्ट्रवादी विचारक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की ।उनके आग्रह पर अथवा उनके विचारों से सहमत होकर अनेक कार्यकर्ता संघ ने राजनीतिक मंच जनसंघ को प्रदान किया। इन्हीं में से एक अटल बिहारी वाजपेई भी थे अपने पूरे राजनीतिक मंच पर कार्य करते हुए अर्थात 1951 से 2004 तक वे संसदीय परंपराओं से जुड़े रहे और अनेक बार सांसद निर्वाचित हुए ।
१२ संसद में अटल जी किसी भी विषय पर गंभीरता के साथ अपने विचार रखते थे । विदेश मंत्रालय से संबंधित विषय पर भी वे सरकार को घेरने से नहीं चूकते थे।इसी कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उनकी कई बार प्रशंसा भी की थी ।इसी बीच जब एक बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भारत में आए तो पंडित नेहरू ने उनका परिचय कराते हुए उनसे कहा था ” यह विपक्ष का युवा नेता हमेशा मेरी आलोचना करता है पर मुझे इसमें भारत के उज्जवल भविष्य की झलक मिलती है”। इसी के साथ एक अन्य प्रसंग में उन्होंने वाजपेई जी के भविष्य में प्रधानमंत्री बनने की बात भी कही थी ।
१३ कालांतर में समय बदला और 1975 में भारत में अनेक स्थानों पर जन आंदोलन ने सरकार को परेशान कर दिया। इसी बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी का निर्वाचन अवैध घोषित हुआ और उन्होंने संसदीय परंपराओं को तात्पर्य रखकर आपातकाल की घोषणा कर दी ।समय गुजरता गया और 2 साल बाद जब फिर आम चुनाव हुए तो 1977 में मोरारजी के मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार में 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने कार्य किया ।यह कार्यकाल भारत पाक संबंधों का संबंध स्वर्णिम काल माना जाता है ।राजीव गांधी की मृत्यु पर जब पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आए थे तो उन्होंने कहा था वाजपेई जी ,मैं आपसे पहले कभी नहीं मिला लेकिन मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि जब आप विदेश मंत्री थे तो उसे समय जैसे मधुर संबंध कभी नहीं हुए निर्बाध रूप से वाजपेई जी ने भारत की जो विदेश नीति थी उसके आधार पर जो कार्य संपादित किया उसका उन्हें प्रतिफल मिला ।
१४ अटल जी संघ के बचपन से स्वयंसेवक थे और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्के समर्थक भी ।जनता पार्टी के संसदीय बैठक में उन्होंने जनसंघ की भूमिका बड़े ही स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा था , संघ से हमारा संबंध बचपन से है। हम जनता पार्टी में 3 वर्ष पहले आए हैं और आप चाहते हैं हम संघ से संबंध तोड़ लें ।
१५ सब जानते हैं कि इसके बाद मोरारजी की सरकार गिर गई थी और पुनः 80 के चुनाव में सत्ता में वापस आ गईं।
” छोटे मन से कोई खड़ा नहीं होता
टूटे मन से कोई बड़ा नहीं होता ”
अटल जी की यह पंक्तियां न केवल उनके व्यक्तित्व का परिचायक हैं अपितु इसके माध्यम से वे आम जन को भी एक बड़ा संदेश देते दिखाई देते हैं ।
१६ राजनीति में सत्ता लोलुपता के बीच निर्विवाद रूप से जनसेवा के लिए प्रस्तुत रहने का सामर्थ्य बहुत कम लोगों में होता है ।दलगत राजनीति के जंगल राज में स्वयं को तटस्थ रखना भी एक कठिन कार्य है ,पर वाजपेई जी ने प्रतिपक्ष के नेता के रूप में, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में भी मर्यादाओं का पालन किया ।इसी कारण वे जनप्रिय नेता बने और आज भी उन्हें याद किया जाता है। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व न दैन्यम न पलायनम का परिचायक है । इसी के साथ वज्रादपि कठोराणी मृदूनि कुसुमादपि का अनुपम उदाहरण भी है।
विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को देखें तो इसकी पुष्टि होती है।
१७ सरकारी तंत्र पर चोट करने का एक उदाहरण देखें, जब एक बार उन्होंने कहा था जब किस को मालूम चलता है कि उसका एक बैल कमजोर हो गया है तब कोई ना कोई व्यवस्था कर बेल बदल देता है किंतु हमारी सरकार सावधान ! धीरे चलिए पुल कमजोर है लिख देती है ।अगर पुल कमजोर है तो उसे रखने की जरूरत क्या है । इस वाक्य को समाज राजनीति और अन्य क्षेत्रों के लिए भी मानक के रूप में देखा जाना चाहिए ।
१८ इसी तरह विपक्ष के नेता के रूप में एक बार बोलते हुए जब सत्ता पक्ष निरंतर टोका टोकी कर रहा था तो उन्होंने आवाज को ऊंचा करते हुए कहा ” अध्यक्ष महोदय ! यह सब क्या हो रहा है ।इस प्रकार की काँव काँव ही करते रहना है तो उन्हें करने दीजिए ।मैं इस काँव काँव के बीच नहीं बोल सकता। अध्यक्ष के फटकारने पर सत्ता पक्ष चुप हुआ और अटल जी खड़े हुए तो किसी ने कहा आपको तो इतना विचलित होते कभी नहीं देखा आप तो अटल हैं ना ?तब उन्होंने तुरंत कहा बिहारी भी तो हूं और संसद हंस पड़ी थी ।यह उनकी हाजिर जवाबी और वाकपटुता का एक सुंदर उदाहरण है।
रामकृष्ण वि सहस्रबुद्धे
नागपुर



