साहित्य

कविता

अवधेश विद्यार्थी

सच में नशीली है आंखें तेरी,
देख करके हमको नशा हो गया,
मयखाने हम तो गए ही नहीं,
हमको शराबी जैसा मजा हो गया,
झटकती तुम जुल्फों, से बिजली गिरे,
तड़कनें सी तड़पन सा ढंग हो गया,
सच में नशीली है आंखें तेरी,
देख करके हमको नशा हो गया ,।।…..1
कटीले से नैनों में काजल लगा,
देख करके हिरनी शर्मा गई है,
पतली कमर में जो लचका लगा,
शर्म से भी नागिन में शर्म आ गई है,
होठों के खुलने से जो चमका लगा,
मेरा मरने के जैसा है ढंग हो गया,
सच में नशीली है आंखें तेरी,
देख करके हमको नशा हो गया।।
✍️ अवधेश विद्यार्थी,
रजपुरा,(सम्भल)

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