
लघु कथा वैधव्य
सविता ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी। इतने में सासू माँ ने सविता के भाई धीरेन्द्र को झल्लाते हुए कहा कि आप अपनी बहन को श्रृंगार करना सिखा रहे हो, उसे वैधव्य जीवन में चूड़ी बिंदी, पाउडर, क्रीम, लिपिस्टिक आदि से दूर रहना होगा। यहाँ तक कि
बिना केश बनाए ही कार्यालय जाना होगा।
धीरेन्द्र ने माँ समझाने की कोशिश की। माँ जी? वो नौकरी पर ऐसे नहींं जा सकती,अगर ऐसे गई तो नौकरी से निकाल दी जाएगी। कितनी मुश्किल से तो जीजा जी के स्थान पर काम मिला है।
माता जी गुस्से में सामने वाली— हिमांशु की मम्मी के पास जाकर कान में कुछ फुसफुसाने लगती हैं।
शाम को सविता जब घर आती है, तो बेटी गोद से नहीं उतरती और उदास होकर कहती है, अब मेरे पापा भी नहीं आते हैं, पता नहीं कहाँ चले गए। मम्मा तुम भी कहाँ चली जाती हो, अकेले मेरा मन नहीं लगता है।
माँ जी गुस्से से कहती हैं! बेटी है, कोई बेटा नहीं। वैसे लडकियों को ज्यादा लाड़ ठीक नहीं होता है। एक तो मेरे बेटे को खा गई हो, ऊपर से रोज रात का खाना देर से बनाती है। पता नहीं ये सब और कब तक झेलना पडेगा।
सविता के सब्र का बाँध टूट गया और वो बोल पड़ी – तो इसमें मेरी क्या गलती है।आप भी तो…कहते हुए सहम जाती है। पर सासु जी ने ताड़ लिया और कहती हैं मेरे पति दायित्व पूरा कर के गए और मुझे पेंशन भी सरकार देती। तुम्हारी तो मेहन्दी भी नहीं उतरी और ये मुसीबत आ गई।
पार्टी में जाने से एक्सीडेंट और भी हुए हैं, सब की मृत्यु नहीं हो जाती है।
सविता की बेटी बड़ी होने के साथ समझदार भी हो गई थी, अब वो माँ का पूरा ख्याल भी रखने लगी। पर सविता सासू माँ से सदैव के लिए दूर होती चली गई।
कविता ए झा
नवी मुम्बई


