आलेख

पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु थे:-नोबेल पुरस्कार विजेता रूडयार्ड किपलिंग

सुनील कुमार महला

हमारे देश में शायद ही कोई बच्चा हो,जिसे ‘जंगल बुक’ के बारे में पता नहीं हो।सच तो यह है कि बच्चों की चहेती ‘जंगल बुक’ सबसे प्रिय और कालजयी कहानियों में से एक रही है। आपको याद होगा कि टेलीविजन पर ‘जंगल जंगल बात चली है…’ लोकप्रिय गीत ‘द जंगल बुक’ की दुनिया का परिचय देता है। वास्तव में, यह जंगल में ‘मोगली'(चरित्र) के आने की खबर है, जिसे सुनकर सभी जानवरों में उत्सुकता फैल जाती है। सरल धुन और कल्पनाशील शब्दों के कारण यह गीत बहुत समय पहले बच्चों में बेहद लोकप्रिय हुआ और आज भी बचपन की याद दिलाता है। पाठकों को बताता चलूं कि इसे विश्वप्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने लिखा था,जिसकी कहानी जंगल में पले-बढ़े बालक मोगली के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे भेड़ियों का झुंड पालता है। मोगली के मित्र बालू भालू उसे जीवन के सरल नियम सिखाते हैं, बघीरा उसे सुरक्षा और समझदारी का पाठ पढ़ाता है, जबकि खतरनाक शेर खान कहानी में रोमांच और संघर्ष का तत्व जोड़ता है। जंगल बुक केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि बच्चों को मित्रता, साहस, अनुशासन, प्रकृति-प्रेम और नैतिक मूल्यों की सीख भी देती है। इसकी सरल भाषा, जीवंत पात्र और रोमांचक घटनाएं बच्चों की कल्पनाशक्ति को उड़ान देती हैं। किताब के साथ-साथ इसके कार्टून और फिल्म रूपांतरणों ने भी इसे पीढ़ियों तक लोकप्रिय बनाए रखा है।

 

बच्चों की सर्वाधिक चहेती और आम जन में लोकप्रिय उनकी कृति-‘जंगल बुक’, नोबेल पुरस्कार तथा भारत से लगाव :-

 

आज के इस आधुनिक दौर में भी जबकि हम सभी एआइ और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के युग में जी रहे हैं, तब भी ‘जंगल बुक’ लगातार बच्चों की चहेती/पसंदीदा कहानी बनी हुई है। रुडयार्ड किपलिंग ब्रिटिश लेखक, कवि और पत्रकार थे,जो साहित्य(लिटरेचर)के अत्यंत प्रभावशाली रचनाकारों(कविता, कहानी, उपन्यास) में गिने जाते हैं। यहां तक कि साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।उनका पूरा नाम जोसेफ रुडयार्ड किपलिंग था तथा उनका जन्म 30 दिसंबर 1865 को बॉम्बे (वर्तमान मुंबई), ब्रिटिश भारत में हुआ था तथा मृत्यु 18 जनवरी 1936 में हुई। रोचक तथ्य यह है कि उनका का नाम रुडयार्ड लेक (इंग्लैंड) से प्रेरित होकर रखा गया था तथा उनकी राष्ट्रीयता ब्रिटिश थी, लेकिन वे हर भारतीय बच्चों के दिलो-दिमाग में राज करते हैं।भले ही उनकी राष्ट्रीयता ब्रिटिश थी, लेकिन चूंकि उनका जन्म भारत में हुआ और उनका बचपन भी यहीं बीता, इसलिए भारत उनकी रचनात्मक चेतना में गहराई से रचा-बसा रहा।किपलिंग का जन्म भले ही बॉम्बे (मुंबई) में हुआ, लेकिन छह वर्ष की उम्र में ही उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने एक कठोर और भावनात्मक रूप से पीड़ादायक बचपन झेला। बाद में उन्होंने लिखा कि यह अनुभव उनके जीवन के सबसे काले अध्यायों में से एक था। दूसरे शब्दों में कहें तो ब्रिटिश नागरिकता के बाद हालांकि,उनकी भारत लौटने की इच्छा थी, पर वे कभी भारत नहीं लौट सके। वास्तव में, वे जीवनभर भारत लौटना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों ने अनुमति नहीं दी। कहा जाता है कि उन्होंने एक बार लिखा-‘भारत मुझे छोड़ गया, पर मैं भारत को कभी नहीं छोड़ सका।’ तात्पर्य यह है कि भारत उनके दिलो-दिमाग में बसा हुआ रहा। सच तो यह है कि भारत की संस्कृति, भूगोल और सामाजिक जीवन उनके साहित्य में बार-बार झलकता है।वर्ष 1907 में उन्हें प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। वे साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले अंग्रेज़ी लेखक और उस समय के सबसे कम उम्र के विजेता थे। यहां उल्लेखनीय है कि 1907 में नोबेल पुरस्कार मिलने के बावजूद किपलिंग ने नोबेल व्याख्यान (नोबल लेक्चर) नहीं दिया तथा यह साहित्य के इतिहास में दुर्लभ उदाहरणों में से एक है। हाल फिलहाल,यदि हम यहां पर उनकी कुछ प्रमुख कृतियों की बात करें तो उनमें क्रमशः द जंगल बुक,जो उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना थी, ‘किम’ उपन्यास, ‘जस्ट हो स्टोरीज'(बाल साहित्य) तथा ‘इफ’ उनकी विश्व की सर्वाधिक चर्चित कविताओं में से एक मानी जाती है।सच तो यह है कि उनकी कविता ‘इफ’ को आज भी प्रेरणादायक जीवन-मंत्र की तरह पढ़ा जाता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उनकी विश्वप्रसिद्ध कविता ‘इफ’ किसी दर्शन ग्रंथ के लिए नहीं, बल्कि अपने बेटे जॉन के लिए लिखी गई निजी सीख थी-जिसमें,एक आदर्श पुरुष और जिम्मेदार नागरिक बनने का संदेश निहित था।चूंकि, वे भारत में जन्मे थे, इसलिए भारत के लोकजीवन से उनका गहरा जुड़ाव था।सच तो यह है कि किपलिंग को रेलवे स्टेशनों, सैनिक छावनियों, डाक-व्यवस्था और अखबारों का विशेष आकर्षण था और वे घंटों-घंटों तक आम लोगों से बातचीत कर कहानियों की सामग्री जुटाते थे।किपलिंग बाल साहित्य से पहले ‘गंभीर लेखक’ माने जाते थे तथा आज वे ‘जंगल बुक’ के कारण बाल साहित्यकार कहे जाते हैं, लेकिन अपने समय में वे राजनीतिक और साम्राज्यवादी विषयों पर लिखने वाले गंभीर लेखक माने जाते थे। जानकारी मिलती है कि प्रथम विश्व युद्ध में उनके इकलौते बेटे जॉन किपलिंग की मृत्यु हो गई थी और इस घटना के बाद किपलिंग का लेखन अत्यंत उदास और आत्ममंथन से भरा हो गया था।हालाँकि, उन्हें अपने समय का एक महान और बड़ा कवि कहा गया, लेकिन किपलिंग खुद को कहानीकार और पत्रकार मानते थे, कवि नहीं।किपलिंग ब्रिटिश साम्राज्यवाद(किसी शक्तिशाली देश का दूसरे देश पर अपने फायदे के लिए नियंत्रण करना) के समर्थक थे, इसी कारण आधुनिक समय में उन्हें विवादास्पद लेखक भी माना जाता है, और इसके कारण उनकी आलोचना भी हुई,लेकिन उनकी साहित्यिक प्रतिभा पर कोई विवाद नहीं है। पाठकों को बताता चलूं कि किपलिंग को मृत्यु के बाद वेस्टमिंस्टर ऐबे के ‘पोएट्स कॉर्नर’ में दफनाया गया था, तथा तह सम्मान बहुत कम लेखकों को मिलता है।हाल फिलहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि ‘द मैन हूं वुड बी किंग’ रुडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध और विचारोत्तेजक कहानी है, जो सत्ता, महत्वाकांक्षा और मानवीय अहंकार पर तीखा व्यंग्य करती है।यह कहानी दो ब्रिटिश साहसी व्यक्तियों-डैनियल ड्रावोट और पीची कार्नाहन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो भारत से आगे काफिरिस्तान पहुँचकर स्वयं को राजा घोषित करने का सपना देखते हैं। वास्तव में यह कहानी केवल रोमांच नहीं, बल्कि एक गहरी सीख भी देती है कि शक्ति बिना विवेक के विनाशकारी होती है, और मनुष्य जब खुद को ईश्वर समझने लगता है, तब उसका अंत निश्चित होता है।

 

साहित्यिक विशेषताएं तथा किपलिंग का साम्राज्य-बोध:-

 

बहरहाल,उनकी साहित्यिक विशेषताओं की यदि हम यहां पर बात करें तो उनकी रचनाओं में औपनिवेशिक भारत, प्रकृति, साहस, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का गहरा चित्रण मिलता है। वे बाल साहित्य और कविता दोनों में समान रूप से लोकप्रिय रहे तथा उनकी भाषा सरल, कथानक सशक्त और पात्र अत्यंत जीवंत होते थे। अंत में यही कहूंगा कि रुडयार्ड किपलिंग को अक्सर केवल ‘जंगल बुक’ के लेखक के रूप में याद किया जाता है, जबकि उनका साहित्यिक व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक और गहन है।सच तो यह है कि वे ऐसे लेखक थे, जिन्होंने अपने निजी जीवन के अनुभवों-विशेषकर विस्थापन और अकेलेपन की पीड़ा को अपने लेखन की सहायता से रचनात्मक रूप दिया। कहना ग़लत नहीं होगा कि भारत में जन्म, फिर कम उम्र में इंग्लैंड भेजे जाने का अनुभव उनके भीतर स्थायी मानसिक संघर्ष छोड़ गया, जो उनकी रचनाओं में बार-बार उभरता है। इसी कारण उनके पात्र केवल कहानी नहीं कहते, बल्कि मनुष्य की आंतरिक लड़ाइयों, असुरक्षाओं और नैतिक द्वंद्वों को भी कहीं न कहीं उजागर करते हैं। किपलिंग का साम्राज्य-बोध भी सरल नहीं था। दरअसल, वे ब्रिटिश साम्राज्य के युग के लेखक थे, पर उनकी रचनाओं में सत्ता के साथ-साथ कर्तव्य, अनुशासन और नैतिक जिम्मेदारी पर भी गहन चिंतन मिलता है। किपलिंग की कविता ‘इफ’ इंसान को सिखाती है कि मुश्किल हालात में भी धैर्य बनाए रखना चाहिए, तथा साहस नहीं छोड़ना चाहिए और अपने व्यवहार में संतुलन बनाए रखना चाहिए।उनकी लोकप्रिय कृति ‘जंगल बुक’ में बताए गए नियम केवल जंगल के नहीं हैं, बल्कि वे कहीं न कहीं मानव समाज के नियमों जैसे हैं, जहाँ अनुशासन, मर्यादा और जिम्मेदारी ज़रूरी होती है और यह बात जिन्होंने ‘जंगल बुक’ को टेलीविजन पर देखा है, उससे साफतौर पर पता चलती है। वास्तव में सच तो यह है कि किपलिंग अंधी ताकत या ज़ोर-जबरदस्ती का कहीं भी किसी भी स्टेज पर समर्थन करते नजर नहीं आते हैं, बल्कि वे यह बताते नजर आते हैं कि असली शक्ति नैतिकता, आत्मसंयम और सही आचरण में होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रुडयार्ड किपलिंग पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु थे। गौरतलब है कि भारतीय संस्कृति, प्रकृति, लोककथाओं और जीवन-दृष्टि को उन्होंने पश्चिमी पाठकों तक पहुँचाया, वहीं पश्चिमी अनुशासन और सोच को भारतीय परिवेश में रखकर देखा। यही द्विसांस्कृतिक दृष्टि उनकी रचनाओं को आमजन में सार्वकालिक और लोकप्रिय बनाती है। इसलिए किपलिंग को समझना केवल उनके लोकप्रिय चेहरे को जानना नहीं, बल्कि उस गहराई को महसूस करना है जहाँ साहित्य, संस्कृति और मनुष्य का अंतर्मन एक-दूसरे से संवाद करते हैं।

 

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।मोबाइल 9828108858/9460557355

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