साहित्य

संगम तट महाकुंभ

डा राजेश तिवारी मक्खन

देव व दानव ने किया , मंथन सागर जाय ।
पहले निकला गरल था , देख सभी घबराय ।।
चौदह रतन प्राप्त हुए , बांट लिए सब भाय।
अमृत कलश को देखकर , दिये सभी हरषाय ।।
लक्ष्य था अमृत प्राप्ति का , होते सभी प्रसन्न ।
पहले हम हि पीयेंगे , नहीं चाहिए अन्न।।
अमृत कलश को गरुण ले , उड़ कर गे आकाश।
वेग ताप ऐसा हुआ , कोउ न आया पास।।
कुछ बूंदे छलकी जहां , वहां होत है कुंभ।
प्रयागराज हरिद्वार व , उज्जैन नासिक कुम्भ!!
आस्था अरु विश्वास से , विश्व भरे के लोग ।
अर्थ धर्म कामादि का , मुक्ति करत उपभोग ।।
अधिक अखाड़े संत संग , नागा साधू आय ।
ज्ञान भक्ति वैराग्य का , संगम देत दिखाय ।।
महाकुंभ प्रयाग का , यह पावन है पर्व ।
देव दनुज नर नाग मुनि , यहां आत हैं सर्व ।।
कल्प वास करते वहां , आकर ठहरत लोग ।
तन के मन के वचन के मिट जाते सब रोग ।
माघ मकर जब रवि चले छा जाता है हर्ष ।
कृषक कामना करत है मंगलमय हो वर्ष ।।
महाकुंभ का पर्व यह सत्य सनातन जान।
भारत सा नहीं देश कोई और विश्व में आन ।

डा राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र

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