साहित्य

श्रृंगार

कनक

मुहब्बत हो गई तुमसे लो झनकार करते हैं
सोलह श्रृंगार से सजी दुल्हन इकरार करते हैं।।

तेरी ही मुहब्बत का हमेशा इंतकाम करते हैं
माथे पर बिंदिया चूड़ियों का चमत्कार करते हैं।।

कोयल की भांति बोली, नाक में नथनी कमाल
मेहंदी रची हाथ में कंगन ही अंबार करते हैं।।

सोलह श्रृंगार किया प्रियतमा तुमने मेरे ही लिए
आंखो में काजल स्नेह दुलार तुमसे ही करते हैं।।

सजी धजी गणगौर पर दुल्हन दिल हुआ सुर्ख
आज गणगौर पर दुल्हन का श्रृंगार करते हैं।।

मुहब्बत हो गई तुमसे ही तुम्ही से दिल आरपार
तुम्हारी ही मुहब्बत में सनम गुलजार करते हैं।।

कनक

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