साहित्य

स्मृति शेष अटल बिहारी

डॉ गीता पांडेय अपराजिता


रहा हमेशा सादा जीवन, जान रही दुनिया सारी।
जनमानस में रचे बसे जो,ऐसे थे अटल बिहारी।।

सुनकर उच्च विचार सदा ही सुरभित मन का हर कोना।
तन मन रहा स्वदेशी हरदम, अनुभव था सुखद सलोना।
साहस शौर्य भरा था उर में, क्षमता थी अद्भुत न्यारी।।
जन मानस———–

दीन-हीन का बने सहारा, सबको गले लगाते थे।
सत की राह हमेशा चलकर, सारे धर्म निभाते थे।।
जज्बा भरकर बढ़ना सीखे, सतत प्रयास रहा जारी।
जनमानस————-

ज्ञान सृष्टि के सर्जक बनकर, अपनी लेखनी चलाए।
जन-जन तक मन की सब बातें, लेखन द्वारा पहुंँचाए।।
हिंदी का सम्मान बढ़ाया रहे हिंद के उपकारी।
जनमानस—————-

भूखे को मिल जाए भोजन, भारत प्रखर बनाना है।
सर्वधर्म समभाव में रहना प्रीत-रीत सिखलाना है।।
बना यही उद्देश्य अटल था,महके जग की फुलवारी।
जनमानस————–

देश प्रेम के परम पुजारी, राजनीति मर्मज्ञ रहे।
अद्भुत अनुभव निज था उनका,ज्ञाता वह सर्वज्ञ रहे।
भरे मंच से कमियांँ अपनी, स्वयं इन्होंने स्वीकारी।।
जनमानस———–

बात रही हो चाहे जैसी, उसको थे नहीं छिपाए।
जीवन में जो कर्म किए थे, भेद सभी ही बतलाए।।
पत्रकारिता में सिद्ध हस्त,अरि पर सदा रहे भारी।।
जनमानस में रचे बसे जो,ऐसे थे अटल बिहारी।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
रायबरेली उत्तर प्रदेश

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