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सनातन संस्कृति की झलक सबसे अलग-आचार्य धीरज “याज्ञिक”

हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

31 दिसम्बर रात्री 12 बजे को क्या नया हो रहा है ?
न ऋतु बदली न मौसम
न कक्षा बदली न सत्र
न फसल बदली न खेती
न पेड़ पौधों की रंगत
न सूर्य चंद्रमा ग्रहों की दशा दिशा
ना ही नक्षत्र

01 जनवरी आने से पहले ही सब नववर्ष की बधाई देने लगते हैं मानो कितना बड़ा पर्व है।
नया मात्र एक दिन ही नही होता।
कुछ दिन तो नई अनुभूति होनी ही चाहिए।
आखिर हमारा देश त्योहारों का देश है।

ईस्वी संवत का नया साल 01 जनवरी को और “भारतीय नववर्ष” (विक्रमी संवत) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। आईये देखते हैं दोनों का तुलनात्मक अंतर—

1- प्रकृति-
01 जनवरी को कोई अंतर नही जैसा दिसम्बर वैसी जनवरी। चैत्र मास में चारो तरफ फूल खिल जाते हैं,पेड़ो पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारो तरफ हरियाली मानों प्रकृति नया वर्ष मना रही हो।

2- वस्त्र-
दिसम्बर और जनवरी में वही वस्त्र,कंबल,रजाई,ठिठुरते हाथ पैर।
चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है,गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है।

3- विद्यालयों का नया सत्र-
दिसम्बर जनवरी वही कक्षा कुछ नया नहीं। जबकि मार्च अप्रैल में स्कूलो का रिजल्ट आता है नई कक्षा नया सत्र यानि विद्यालयों में नया वर्ष।

4- नया वित्तीय वर्ष-
दिसम्बर-जनवरी में कोई खातो की क्लोजिंग नही होती। जबकि 31 मार्च को बैंको की क्लोजिंग होती है नए बही खाते खोले जाते हैं। सरकार का भी नया सत्र प्रारंभ होता है।

5- कलैण्डर-
जनवरी में मात्र नया कलैण्डर आता है। जबकि चैत्र में नया पंचांग आता है।उसी से सभी भारतीय पर्व,विवाह और अन्य महूर्त देखे जाते हैं। इसके बिना हिन्दू समाज जीवन की कल्पना भी नही कर सकता इतना महत्वपूर्ण है ये पंचांग।

6- किसानों का नया वर्ष –
दिसंबर-जनवरी में खेतों में वही फसल होती है। जबकि मार्च-अप्रैल में फसल कटती है नया अनाज घर में आता है तो किसानों का नया वर्ष और उतसाह रहता है।

7- पर्व मनाने की विधि-
31 दिसम्बर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर मदिरा पान करते है,हंगामा करते है,रात को मदिरा पीकर गाड़ी चलने से दुर्घटना की सम्भावना,रेप जैसी वारदात,पुलिस प्रशासन बेहाल और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश। जबकि भारतीय नववर्ष व्रत से प्रारंभ होता है पहला नवरात्र होता है घर घर मे माता रानी की पूजा होती है शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है I

8- ऐतिहासिक महत्त्व-
01 जनवरी का कोई ऐतेहासिक महत्व नही है। जबकि चैत्र प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत,श्री झूलेलाल का जन्म, नवरात्रि प्रारम्भ,ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना इत्यादि का संबंध इस दिन से है।

अंग्रेजी कलेंडर की तारीख और अंग्रेज मानसिकता के लोगो के अलावा कुछ नही बदलता।

अपना नव संवत् ही नया वर्ष है।
जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य चंद्रमा की दिशा,मौसम,फसल,कक्षा,नक्षत्र,पौधों की नई पत्तिया,किसान की नई फसल,विद्यार्थीयों की नई कक्षा,मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते है जो विज्ञान आधारित है I

अपनी मानसिकता को बदलें विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचाने स्वयं सोचें की क्यों मनाये हम 31 दिसम्बर रात्री 12 बजे को नया वर्ष ?

“मात्र कैलेण्डर बदलें,अपनी संस्कृति नहीं”।आओ स्वयं जागें,औरों को भी जगायें,भारतीय संस्कृति अपनायें।
।। सबका मंगल हो ।।
।। आचार्य धीरज “याज्ञिक” ।।

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