साहित्य

प्रेम-प्यार-ममता

ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव

माँ के प्यार का मोल नहीं,यही तो दुनिया में अनमोल।
स्तन से लगा दूध पिलाए शिशु को,अद्वितीय बेमोल।।

नि:स्वार्थ प्रेम ममता प्रतीक,वात्सल्य के मधुरम बोल।
उसके नेह स्नेह लाड़ प्यार,का सर्वाधिक होता मोल।।

चौरासी लाख योनियों में,सभी अपने ढंग करते प्यार।
जीव जंतु पशु पक्षी मानव,कौन नहीं करता है प्यार।।

मानव जीवन में बड़ा ही,महत्वपूर्ण शब्द है प्रेम-प्यार।
जन्म बाद से माता-पिता,परिवार परिजनों का प्यार।।

भाई-बहन के अटूट रिश्ते में,पावन प्यार और ममता।
रक्षाबंधन भाईदूज के दोनों,पर्व प्रतीक में है समता।।

माता के प्यार में होती है,बच्चों के प्रति गहरी ममता।
गुरुश्रेष्ठ हृदय में होती,शिष्यों प्रति प्यार एवं समता।।

बचपन-बुढ़ापे तक हरेक,सामाजिक रिश्ते में है प्यार।
बहुधा किशोर-जवान,बाल-बाला सबमें पनपे प्यार।।

बदले वक्त में पहले सा,न अपनापन न दिखता प्यार।
आज वासना भरे नजर से,वह करते छद्म प्रेम-प्यार।।

प्यार जरूरी करना यह करिए,सुंदर वसुधा से करिए।
अनुपम सृष्टि से करें प्यार,प्रकृति पुजारी बन रहिए।।

वृक्षों से प्रेम करें जीवन में,फल फूल से संपन्न रहिए।
ईश प्रेम-प्यार में रहें सदा,स्वस्थ सुखी हर्षित रहिए।।

ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!