
प्राचीन भारतीय वाङ्मय से लेकर अर्वाचीन साहित्य तक में प्रकृति के प्रत्येक कण-कण में परमेश्वर की परमसत्ता और सर्वव्यापकता की संकल्पना सहज रूप से उपलब्ध होती है। यहाँ ईश्वर किसी एक लोक, एक जाति या एक प्राणी तक सीमित नहीं, बल्कि रोम-रोम में राम के रूप में प्रतिष्ठित है। यही कारण है कि भारतीय भक्ति परंपरा में साधक कवियों की एक सुदीर्घ परंपरा विकसित हुई, जिसकी श्रेष्ठता को कवि केशवदास ने प्रसिद्ध दोहे में रेखांकित किया—
“सूर सूर तुलसी शशी, उडगन केशवदास।
अब के कवि खद्योत सम,जहाँ-तहाँ करत प्रकाश।।”
संस्कृत वाङ्मय में जहाँ महाकवि कालिदास को
“पुरा कवीनां गणना प्रसंगे, कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः”
कहकर कविकुल-गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, वहीं आधुनिक पाश्चात्य आलोचना ने कालिदास की तुलना विलियम शेक्सपियर से करते हुए “कालिदास को भारत का शेक्सपियर कहा जाता है” जैसा कथन दिया। यह तुलना स्वयं में भारतीय साहित्य की ऊँचाई को स्वीकार करने का एक प्रमाण है।इसी क्रम में अंग्रेज़ी साहित्य के महत्त्वपूर्ण कवि जॉन मिल्टन और उनके महाकाव्य पैराडाइज लास्ट का उल्लेख अपरिहार्य हो जाता है। मिल्टन का कथन है—
“God does not need either man’s work or His own gifts.”
अर्थात् परमेश्वर को न तो मनुष्य के कर्मों की आवश्यकता है और न ही उसके उपहारों की।
इसके ठीक विपरीत गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस में ऐसा ईश्वर-दर्शन मिलता है, जहाँ प्रभु स्वयं भक्तों के सहयोग से अपनी लीला पूर्ण करते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय और पाश्चात्य ईश्वर-दर्शन का मूलभूत विभेद स्पष्ट होता है।
मिल्टन की पैराडाइज लास्ट निस्संदेह एक महान काव्यकृति है, जो ईश्वर की परमसत्ता, अनुशासन और दायित्वबोध का बोध कराती है। किंतु मिल्टन का ईश्वर निराकार, निरपेक्ष और मनुष्य से दूरी बनाए रखने वाला न्यायाधीश है। वह मनुष्य के कर्मों से प्रभावित नहीं होता।मिल्टन का जीवन स्वयं इस दर्शन से गहरे रूप में जुड़ा है। यौवनावस्था में वह अपनी विद्वता के अहं में यह मान बैठता है कि वह ईश्वर को दूसरों से अधिक जानता है, और अपनी कविता के माध्यम से ईश्वर का प्रचार कर रहा है। इस दम्भ की परिणति यह होती है कि जब 44 वर्ष की आयु में वह अंधा होता है, तो पहले ईश्वर से शिकायत करता है—
When I consider how half my days are spent,
And that one talent lodged with me useless…
यहाँ ईश्वर से प्रश्न है, शिकायत है, किंतु दास्य नहीं।इसके विपरीत तुलसीदास का ईश्वर सगुण, साकार, करुणामय और लोकमंगलकारी है—
“सोइ जानहि जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हहीं होई जाई।।”
यहाँ ईश्वर को जानना भी ईश्वर की कृपा से संभव है। तुलसी स्वयं को सर्वदा दासत्व भाव में रखते हैं—
” सियाराममय सब जग जानी।
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।”
तुलसी का राम लीला में बँधा हुआ ईश्वर है, जो भक्तों के सहयोग को स्वीकार करता है। हनुमान का लंका गमन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है—
” राम काज करि फिरि मैं आवउँ।
सीता की सुधि प्रभुहिं सुनावहुँ।।”
इसके साथ ही हनुमान जी द्वारा समुद्र पार करते समय मैनाक पर्वत के विश्राम करने के आग्रह पर पवनपुत्र हनुमान जी कहते हैं-
“रामकाज किन्हें बिना, मोहि कहाँ विश्राम।”
यहाँ ईश्वर स्वयं भक्त के कर्म से अपनी लीला पूर्ण करता है। यही भारतीय भक्ति-दर्शन की आत्मा है
मिल्टन का ग्रेस सिद्धांत एकतरफा है, जबकि तुलसी की कृपा संवादात्मक है।तुलसी का ईश्वर भक्त के श्रम, त्याग और प्रेम का सम्मान करता है—केवट,शबरी, जटायु,हनुमान,जामवंत सभी इसके उदाहरण हैं।
पाश्चात्य ईसाइयत मुख्यतः मानव-केन्द्रित है, जबकि भारतीय रामकथा सर्वयोनि-व्यापक है। कागभुशुण्डि,जामवंत,हनुमान,सुग्रीव, नल – नील,पक्षीराज गरुड़ आदि रामभक्त धर्म परायण पात्र श्रीराम चरित के प्रात:स्मरणीय पात्र हैं।गौरतलब है कि जटायु जैसा पक्षी,रावण के अधर्म के विरुद्ध युद्ध करता है।वह दशानन को ललकारते हुए कहता है कि –
“रे रे दुष्ट ठाढ़ किन्ह होही।”
रावण से भीषण संग्राम करते हुए जब पंख कट जाते हैं तब जटायु धरातल पर गिर जाता है और आखिर में वह प्रभु की गोद में प्राण त्याग करता है।कागभुशुण्डि, गरुड़, हनुमान, सुग्रीव—ये सब सिद्ध करते हैं कि भक्ति का अधिकार केवल मनुष्य तक सीमित नहीं।
मिल्टन महान कवि हैं, किंतु तुलसी केवल कवि नहीं, सभ्यता के शिल्पकार हैं।मिल्टन का ईश्वर सत्ता है, तुलसी के राम संवेदना हैं,साक्षात् धर्म हैं और मर्यादपुरुषोत्तम हैं।मिल्टन का ईश्वर सिंहासन पर है, तुलसी के राम वन-वन भटकते हुए लोकनायक हैं।अतः यह कहना सर्वथा उचित है कि मिल्टन ईश्वर का कवि है,जबकि तुलसी ईश्वर की संस्कृति हैं।
— डॉ. उदयराज मिश्र
शिक्षाविद् / साहित्यकार




