साहित्य

वो बचपन के दिन अच्छे थे

अतुल कुमार,

वो बचपन के दिन अच्छे थे
जब कागज के जहाज में
अमेरिका, लंदन घूम आते थे,
कागज की कश्ति जब चलती थी
खुशी से झूम जाते थे।।

वो बचपन के दिन अच्छे थे
जब बे रोक टोक खेलते खेलते
पड़ोसियों के घर घूम आते थे,
पड़ोसी का शीशा तोड़ देते थे
फिर गाली भी खूब खाते थे।।

वो बचपन के दिन अच्छे थे
जब गली में कंचों का विश्वकप होता था,
हारने पर कंचे लूट जाते थे,
युद्ध जैसी स्थिति बनाते थे
फिर झगड़ा भूल ठहाके लगाते थे।।

वो बचपन के दिन अच्छे थे
एक दूसरे से चीज बांट कर खाते थे,
वस्तु विनिमय व्यवस्था दिखलाते थे
करके कुट्टी क्षणभर को रूठ जाते थे,
अब्बा कर जल्दी से झगड़े निपटाते थे।।

वो बचपन के दिन अच्छे थे
पिता की डांट खा कर रूठ जाते थे,
मां प्यार से मनाती थी, मान जाते थे,
जिद्द की भी औकात होती थी
जो भी मिल जाए सौगात होती थी।।

वो बचपन के दिन अच्छे थे
जब दूरदर्शन पर चित्रहार होते थे,
रविवार की फिल्म के इंतजार होते थे,
पड़ोसी के घर टी वी देखते थे,
कृषि दर्शन भी मनोरंज के संसार होते थे

वो बचपन के दिन अच्छे थे
जब सत्यनारायण की कथा से संस्कार होते थे,
सबसे पहले हम प्रसाद लेने को तैयार होते थे,
अखबार की थाली कागज का चम्मच बनता,
आधे केले के बस वहीं दीदार होते थे।

वो बचपन के दिन अच्छे थे
जब पंज्जी दस्सी चवन्नी खर्च के संसार होते थे
फिर भी पैसे गुल्लक में जाने को तैयार होते थे,
कैसे पैसे कमाएं,न कोई पाठ होते थे
बचपन की अमीरी के भी ठाठ होते थे।।

अतुल कुमार
गाँव गड़खल
तहसील कसौली
जिला सोलन।
हिमाचल प्रदेश 173201
9805731752

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