
दिन, ग्रीष्म-वर्षा-शीत के;
बितते वर्ष ऐसे किसान के।
पगडंडियों पे इनके रास्ते,
बैसाख,जेठ खूब तपते।
सावन, और कठिन बुझाता
कम नहीं भादो की उष्णता!
अगहन, पूस की ठंडी, ओस,
खेत, खलिहान में गुजरता रोज।
फागुन झूम के होली गाता,
कभी लोरी से दिल बहलाता।
यही जीवन! दिए विधाता
सोचकर मन बहलाता!
बैलों की घंटी संगीत सुनाता!
दूध, मक्खन अमृत बरसाता!
उत्थान- पतन फसल जिनका,
आह! मन कितना विकल इनका।
घर भी मुश्किल से चलता,
फिर भी न दिखाते असमर्थता।
बेटी, रुनझुन माँगती पायल,
तब पिता हो जाता घायल।
होते न दीन, कभी अमीर से
सुख की प्रतीक्षा में दिन इनके।
दिन, ग्रीष्म-वर्षा-शीत के;
बितते वर्ष ऐसे किसान के।
✍️कविता ए झा
नवी मुम्बई




