साहित्य

वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'

कुंडलिया

आना-जाना ज़िंदगी,सच्चा मानव धर्म।
धरती पर छूटे सभी,साथ चलेगा कर्म।।
साथ चलेगा कर्म,सदा यह भाग्यविधाता।
व्यर्थ नहीं यह देह,कर्म कर कहते दाता।।
बदले यही लकीर,कर्म की धरती जाना।
कर्म भाग्य-सम्पत्ति,इसी से उर सुख आना।।

हर संगत रखता सदा,गहरा मनुज!प्रभाव।
कहीं निखरता है मनुज, मिलता कहीं तनाव।।
मिलता कहीं तनाव,तराशो खुद को मानव।
अरुणिम तेरा साथ,सदा झुलसा दे दानव।।
बनो प्रेरणा जीव,आस दो सबको भर-भर।
छोड़ो सदा प्रभाव,कहे आभा-मंडल हर।।

कल तक जो था सामने, लुप्त हुआ वह आज।
गया काल के गाल में,यादों का अब साज।।
यादों का अब साज,वही धुन बजती निस-दिन।
हृदय-सदन है रिक्त,प्रहर हर कटता गिन-गिन।।
जाने कैसी रीति,विदाई जाती है खल।
सब जाते जग छोड़, खड़ा था सँग में जो कल।।

वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.

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