
कलयुग के इस दौर में देखें,गायब सभी मूल्य मर्यादा।
मान सम्मान की फिक्र नहीं,बस बेशर्मी पर आमादा।।
बेंच रहे मर्यादा हैं अपनी,अश्लीलता का लगा बाजार।
एक-दो नहीं चतुर्दिक देखें,मिलते जाएंगे ऐसे हजार।।
वर्तमान पीढ़ी में ज्यादातर,दिखे न जीवन के वे मूल्य।
अश्लीलता के समाज में,धूल धूसरित हुए सब मूल्य।।
फैशन की आंध्र चकाचौंध में,लाज शर्म सब है गायब।
मान सम्मान संस्कार मर्यादा,की यह फिक्र न साहब।।
दृष्टि-सोच सभी की गंदी,भोग-विलास ही बस चाहत।
सामाजिक पटलों पर भी,अश्लीलता कराती आहत।।
शीलसिंधु की गहराई-सी,अब मानव में है न सभ्यता।
निर्लज्जता अभद्रता फूहड़पन,फले फूले असभ्यता।।
अश्लील हुआ नारी तन मन,कारण पाश्चात्य सभ्यता।
फूहड़ता के नर भी दोषी हैं,बढ़ती वासना अभद्रता।।
इतना फूहड़ हुआ जमाना,युवाओं में भरी है अभद्रता।
क्या युवक क्या युवती,स्त्री-पुरुष किसी में न भद्रता।।
अर्धनग्न बार बालाएं ही,क्लबों में नंगा नाच हैं करतीं।
घर परिवार समाज चिंता तज,जरूरतें हैं पूर्ण करतीं।।
दलालों के चंगुल में फंस,चुनतीं अनैतिक देह व्यापार।
अश्लीलता के अड्डे पर बैठी,ग्राहक ढूंढें दिनभर यार।।
सामाजिक नियम संयम की,श्वेत चादरें धूमिल करतीं।
बुरे व्यसन में पग धरें एक बार,तो निकल न सकतीं।।
कमी न केवल नारी की,समाज भी इसका जिम्मेदार।
घृणित नर्ककर्म में लगे,दुष्कर्मी पुरुष भी हैं ठेकेदार।।
ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.



