
मैं रहूँ न रहूँ, पर देश रहे, हर साँस-साँस में देश रहे।
मेरी राख भले उड़ जाए कहीं, पर माटी का गौरव शेष रहे।
न झुके क़लम, न बिके ज़मीर, सच बोलना ही श्रृंगार रहे,
जो न्याय माँगे, जो प्रश्न करे, वही सच्चा पहरेदार रहे।
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, संविधान ही सबका आधार रहे,
हर हाथ में अधिकार मिले, हर मन में निर्भय विचार रहे।
न सत्ता मद में अंधी हो, न जनता मौन असहाय रहे,
लोकतंत्र तभी जीवित है, जब संवाद सदा सहाय रहे।
नफरत की आँधी थम जाए, भाईचारा पहचान रहे,
हर मज़हब, हर भाषा में, बस भारत की मुस्कान रहे।
श्रम का मान, श्रम का स्वप्न, हर चौखट तक विस्तार रहे,
मेहनत का पसीना बोले, यही राष्ट्र का संस्कार रहे।
*दया भट्ट दया ,खटीमा, (देवभूमि ,उत्तराखंड* )🇮🇳




