
दोस्त मेरा वो पुराना आ गया।
हाथ में कोई ख़ज़ाना आ गया।
तन्हा तन्हा जिन्दगी मायूस थी,
अब नया सपना सजाना आ गया।
दिल से दिल की बात उसने पूछा तो,
ज़ख़्म-ए-दिल मरहम लगाना आ गया।
होंठ पर मुस्कान ये नकली लिए,
दर्द-ए-दिल अपना छुपाना आ गया।
राहबर जबसे सियासतदाँ मिला,
दाग़ ग़ैरों पर लगाना आ गया।
इस जहाँ ने इस क़दर धोखा दिया,
पीठ पर खंज़र चलाना आ गया।
कर लिया है सिरफिरों की दोस्ती,
राह में काँटे बिछाना आ गया।
चनरेज राम अम्बुज




