साहित्य

ग़ज़ल

चनरेज राम अम्बुज

दोस्त   मेरा   वो    पुराना    आ   गया।
हाथ  में    कोई    ख़ज़ाना   आ   गया।

तन्हा    तन्हा    जिन्दगी   मायूस   थी,
अब  नया  सपना  सजाना  आ   गया।

दिल  से  दिल  की बात उसने पूछा तो,
ज़ख़्म-ए-दिल मरहम लगाना आ गया।

होंठ   पर   मुस्कान   ये   नकली  लिए,
दर्द-ए-दिल  अपना  छुपाना  आ  गया।

राहबर    जबसे    सियासतदाँ   मिला,
दाग़    ग़ैरों   पर   लगाना   आ    गया।

इस  जहाँ  ने  इस  क़दर  धोखा  दिया,
पीठ   पर   खंज़र   चलाना  आ  गया।

कर  लिया  है   सिरफिरों  की  दोस्ती,
राह   में   काँटे   बिछाना    आ   गया।

चनरेज राम अम्बुज

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