साहित्य

ग़ज़ल

चनरेज राम अम्बुज

आँखें  मिली  मगर  मेरी  चाहत  न मिल सकी।
उल्फ़त में कोई दिल से इज़ाज़त न मिल सकी।

चाहा था जिसको मैने दिल-ओ-जान से कभी,
वो  बे-वफ़ा मुझे  मेरी  निस्बत न  मिल  सकी।

मज़लूम  दर-बदर  यूँ  भटकता  ही  रह गया,
इन्साफ़  को  मगर वो अदालत न मिल सकी।

ये  दर्द-ओ-गम  तुम्हारा  भला  कैसे  जानता,
तेरी  तरफ  से  कोई  शिकायत न मिल सकी।

मंजिल पे आ के पाँव  मेरे  फिर फिसल गये,
लगता ख़ुदा की मुझको इनायत न मिल सकी।

उल्फ़त  के  कैदखाने  में   मुद्दत  से  कैद  हूँ,
पर वस्ल की मुझे तो  जमानत न मिल सकी।

*अम्बुज* बिका  ज़मीर  शरीफों  के  शहर  में,
सच बोलने की मुझको भी हिम्मत न मिल सकी।

चनरेज राम अम्बुज

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