
क्या खोया, क्या पाया, ये सवाल बहुत पुराने हैं,
पर हर साल के अंत में ये और भी बेमाने हैं।
वक़्त के पन्नों पर दर्ज हैं हँसी के कुछ अफ़साने,
और आँसुओं की स्याही से लिखे कई अनकहे तराने।
कुछ सपने अधूरे रह गए, कुछ नींद में ही टूटे,
कुछ थे सच इतने भारी कि हौसले ही रूठे।
जिन पर भरोसा था सबसे ज़्यादा, वही परखे गए,
और जो अनजान थे कभी, वही अपने से लगे।
हर हार ने भीतर कुछ तो बदला, कुछ तो छीना है
हर जीत ने भी चुपचाप अहं का एक हिस्सा जीता है ।
जो पीछे छूट गया, वही शायद ज़रूरी नहीं था,
जो साथ रहा, वही आत्मा का सच्चा आईना था।
दुख ने ठहरना सिखाया, सुख ने चाहा बहकाना,
दोनों के बीच कहीं मैंने खुद को थोड़ा सा पहचाना।
कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं, फिर भी बेपरवाह रही,
कुछ मौनों में ही जीवन की सबसे गहरी बात बसी।
यह साल गया नहीं, भीतर कहीं समा गया है,
जो खोया ,जो पाया वही रास्ता बना गया है।
सुमन बिष्ट, नोएडा




