साहित्य

कैसा रचे विधान

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

चिंतन में हो रही गिरावट,सुखद नहीं परिणाम।
धन-धन करते निधन हुआ,छूट गया धन धाम ।।

खाली हाथ मनुज जग आता,जाता खाली हाथ ।
कितना भी धन संचय कर लो,अंत छोड़ता साथ ।।
सत्कर्मों से धन अर्जित कर,मत भूलो प्रभु नाम।
चिंतन _ _ _ _ _ _ _ _

आज बदलती संस्कृति देखो,लालच लिप्सा भोग ।
भूमित संकल संसार हुआ है ,धर्म कर्म कहँ योग ।।
माटी की जो मिली सुकाया,मानवता हो दाम।
चिंतन _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _

धन के वशीभूत हो मानव,जाता सब कुछ भूल ।
त्रिविध ताप से मुक्त चित्त में,रहे बिछाता शूल ।।
कभी नहीं संतोष मिले हैं,नहीं भाव निष्काम।
चिंतन_ _ _ _ _ _ _ _

नए तरीके निशिदिन ढूँढे,बदल गया इंसान।
धन से उपजे अहम ह्रदय में,मिले न शुभ पहचान।।
पागल है सब धन के पीछे ,भगते आठो याम।
चिंतन_ _ _ _ _ _ _ _ _

केवल धन को ही मत मानो,जीवन का आधार ।
इक दूजे की पीड़ा समझो,यही ज्ञान का सार।।
रिश्ते नाते रहो सहेजें,मिलता है आराम ।
चिंतन_ _ _ _ _ _ _ _ _

करे लोग धनवानों का ही,इस जग में सम्मान।
निर्धन का उपहास कराते,कैसा रचे विधान ।।
एक नजर से सबको देखो,पिला भक्ति का जाम।
चिंतन_ _ _ _ _ _ _ _ _
आओ मिल संकल्प सभी ले, विजया दशमी पर्व।
जीत बुराई पर अच्छाई,मिटे कलुषता सर्व।।
अंतस के रावण को मारो, मचा हुआ कुहराम।
चिंतन————–

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
रायबरेली उत्तर प्रदेश
9415 71 8838

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