
साल बदला पर हाल ना बदला,
सदियों से था सवाल ना बदला।
कि कैसे सुधारें ज़माने को हम,
गाँव-गढ़ी-घर-संसार ना बदला।
यूं ही बिछड़ने मेरे नसीब में थे,
वक़्त बीत गया प्यार ना बदला।
जिसका उम्मीद था वर्षों तलक,
उसके बारे में ख़्याल ना बदला।
नफ़रत के “रहमत” कई रूप हैं,
पर प्रेम का सुर-ताल ना बदला।
शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती (उ. प्र.)
7317035246



