
बीती बात बिसार दो,करो कर्म अविराम।
आंग्ल वर्ष नव हँस यहाँ,लाया नव पैगाम।।
लाया नव पैगाम,न हो अनहोनी घटना।
जगे हृदय अनुराग, नाम रघुवर का रटना।।
हिंसा हो अब लुप्त,यही आशा ले जीती।
क्षमा-दान दो जीव!बिसारो बातें बीती।।
सागर की मैं बूँद हूँ,यही हुआ अहसास।
प्राप्त देह में लक्ष्य है,जीवन-उत्सव खास।।
जीवन-उत्सव खास,विदा सबको है होना।
किसका मन को दंभ,धरा का सब कुछ खोना।।
सब परिवर्तनशील,देह की फूटे गागर।
जल सम यह जो जीव,मिले जाकर के सागर।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.




