साहित्य

लक्ष्मी का गुप्त वास: एक सीख

सत्येन्द्र कुमार पाठक

सोमदत्त अपने शहर का एक प्रतिष्ठित व्यापारी था। व्यापार में सब कुछ ठीक था, लेकिन पिछले कुछ समय से घर में अशांति और आर्थिक तंगी ने डेरा डाल लिया था। फिजूलखर्ची बढ़ गई थी और परिवार के सदस्यों में अक्सर अनबन रहती थी। एक दिन सोमदत्त के पुराने मित्र और विद्वान वास्तुशास्त्री, पंडित विद्याधर उनके घर पधारे।
ड्राइंग रूम में बैठते ही विद्याधर की नजर कोने में खड़ी एक टूटी हुई झाड़ू पर पड़ी। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, “सोमदत्त, तुम लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए बड़े-बड़े अनुष्ठान तो करते हो, लेकिन तुमने साक्षात लक्ष्मी के प्रतीक का तिरस्कार कर रखा है।”
सोमदत्त चकित होकर बोला, “मित्र, मैं समझा नहीं। मैंने किसका तिरस्कार किया?”
विद्याधर ने कोने की ओर इशारा करते हुए कहा, “उस झाड़ू का। जिसे तुमने उल्टा खड़ा कर रखा है। क्या तुम जानते हो कि झाड़ू केवल कचरा साफ करने वाला उपकरण नहीं, बल्कि दरिद्रता को घर से बाहर निकालने वाली ‘महालक्ष्मी’ का गुप्त स्वरूप है?”
पंडित जी ने समझाना शुरू किया, “जैसे धन को तिजोरी में छिपाकर रखा जाता है, वैसे ही झाड़ू को भी नजरों से बचाकर रखना चाहिए। इसे खुले में रखना या किसी की सीधी नजर पड़ना घर की बरकत को कम करता है। तुमने इसे खड़ा करके रखा है, जो घर में कलह का कारण बनता है। शास्त्रों में झाड़ू को लिटाकर रखने का विधान है।”
उसी समय सोमदत्त की पत्नी ने रसोई से निकलते हुए एक बिल्ली को झाड़ू मारकर भगाया। विद्याधर ने तुरंत टोका, “बहन! यह भूल कभी मत करना। झाड़ू से किसी जीव को मारना साक्षात लक्ष्मी को लात मारने के समान है। शीतला माता के हाथ में झाड़ू स्वच्छता और आरोग्य का संदेश देती है। इसका अपमान रोगों और दुर्भाग्य को निमंत्रण देता है।”
सोमदत्त ने जिज्ञासावश पूछा, “क्या झाड़ू लगाने का भी कोई निश्चित समय होता है?”विद्याधर बोले, “बिल्कुल। सूर्योदय के समय सफाई करना सकारात्मकता लाता है, लेकिन सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाना वर्जित है। माना जाता है कि गोधूलि वेला में लक्ष्मी का आगमन होता है, और उस समय झाड़ू लगाने से हम घर की खुशहाली को ही बाहर फेंक देते हैं। साथ ही, झाड़ू को हमेशा नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में रखना चाहिए ताकि घर की स्थिरता बनी रहे।”पंडित जी की सलाह मानकर सोमदत्त ने शनिवार के दिन पुरानी और टूटी हुई झाड़ू को सम्मानपूर्वक विसर्जित किया और प्राकृतिक सींक वाली नई झाड़ू लेकर आया। उसने घर के मुख्य द्वार के पीछे एक छोटी झाड़ू छिपाकर टांग दी, ताकि नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश रुक सके। कुछ ही हफ्तों में घर का वातावरण बदलने लगा। अनावश्यक खर्च रुक गए और व्यापार में फंसा हुआ धन वापस आने लगा। सोमदत्त को समझ आ गया कि समृद्धि केवल बड़ी तिजोरियों में नहीं, बल्कि घर के सबसे छोटे कोने की सफाई और वहां रखी वस्तुओं के प्रति हमारे सम्मान में छिपी होती है। स्वच्छता ही ईश्वरत्व है। जब हम छोटी से छोटी वस्तु (जैसे झाड़ू) का सम्मान करते हैं, तो हम प्रकृति और दैवीय ऊर्जा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त हो जाता है।
करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

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