साहित्य

मकर संक्रान्ति

नरेश चन्द्र उनियाल

शुभ दिन अरु शुभ वार है आया,

उत्तरायणी का त्यौहार है आया,
सूर्यदेव आ गये मकर में,
मौसम अब खुशगवार है आया।

मकर संक्रान्ति, बिहू अरु पोंगल,
नाम लोहिड़ी करते मंगल,
कर स्नान पावन नदियों में,
करके दान, हटे अमंगल।

पंडित दीनों को खिचड़ी देते,
गुड़ तिल का भी भोग लगाते,
ढ़ोल नगाड़ा खूब बजाकर,
मूंगफली रेवड़ी हैं खाते,

पतंग उड़ाने का यह दिन है,
हर्षित बेला हर पल छिन है,
ढीली कर दो डोर और भी,
उड़ने की तमन्नायें अनगिन है,

देखो उधर लगा है मेला,
बहुत शोरगुल भीड़ का रेला,
कुछ चरखी में बैठ झूमते,
बड़ी खुशी की है यह बेला,

नया पर्व, रुत, नई है आशा,
सबकी प्रेमरस मय हो भाषा,
सबका मंगल हो नववर्ष में,
‘नरेश’ की बस यह ही अभिलाषा।

*✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,*
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।

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