
‘विश्व हिन्दी दिवस’ के संदर्भ में माँ भारती के चरणों में 18 दोहों का पुष्प-गुच्छ
प्रथम वंदूँ माँ भारती, ज्ञान पुंज आधार।
अक्षर-अक्षर मंत्र हो, सुखी रहे संसार।।
भारत भारती गूँजती, जन-जन के विश्वास।
कोटि-कोटि कंठों बसा, पावन भाव प्रकाश।।
हिमगिरि जिसका मुकुट है,सागर चरण पखार।
ऐसी अद्भुत भारती, करती बेड़ा पार।।
विविध वेश भाषा विमल, सुरभित एक गुलाल।
भारत भारती रूप में, चमके भाग्य विशाल।।
वेद-पुरानन की धरा, उपनिषद को ज्ञान।
भारती के आँचल पला,जग का गौरव मान।।
विकसित भारत का सुभग, जाग रहा संकल्प।
परिश्रम ही मूल है, और न कोई विकल्प।।
गाँव-शहर जुड़ते गए, सजी प्रगति की राह।
विकसित भारत ध्येय है, जन की यही चाह।।
खेत-खलिहानों में खिला, सुखी किसान का भाल।
विकसित भारत हो रहा, सुख-समृद्धि निहाल।।
कौशल भारत की भुजा, रचती नवल विधान।
युवा शक्ति के स्वप्न से, बढ़ा देश का मान।।
नभ में उड़ते पंख अब, पाताल छुए विज्ञान।
विकसित भारत की कथा, लिखता स्वाभिमान।।
स्वच्छ-स्वस्थ सुंदर धरा, संयम का व्यवहार।
विकसित भारत का यही, असली है श्रृंगार।।
विश्व गुरुआइन भारती, जग को देती ज्ञान।
प्रेम-अहिंसा-धर्म का, करती ऊँचा मान।।
अंधकार जब-जब बढ़ा, भटका सकल समाज।
विश्व गुरुआइन भारती, आई बन आवाज़।।
योग और अध्यात्म से, मन का मिटे क्लेश।
विश्व गुरुआइन भारती, देती यही सन्देश।।
विश्व भारती बन गई, अब वसुधा परिवार।
सबका हित अपना हुआ, मिटा द्वेष-दीवार।।
सीमाओं के पार भी, स्नेह लुटाती जाए।
विश्व भारती शांति का, अनुपम दीप जलाए।।
सत्य-अहिंसा सार है, मानवता कल्याण।
विश्व भारती के चरण, झुके सकल जहान।।
अंत भला तो सब भला, पूर्ण हुआ यह गान।
भारती की जय-जय मचे, अमर रहे अभिमान।।
डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी
सहायक आचार्य एवं अध्यक्ष
हिन्दी विभाग
एस.आर.आर.कला एवं विज्ञान महाविद्यालय
करीम नगर, तेलंगाना राज्य।




