साहित्य

भरोसेलाल का भरोसा–(हास्य-व्यंग्य)

जयचन्द प्रजापति 'जय'

मैं भरोसेलाल एक भरोसे का आदमी हूँ। कोई भी चिकनी चुपड़ी बातें की। उस पर सर्वत्र न्योछावर कर देने की ताकत रखता हूँ। एक बार एक कवि सम्मेलन में गये। कवि सम्मेलन में कई महिलायें भी आई थी।

एक स्त्री मुझ पर मुग्ध हो गयी। मेरा ह्रदय गदगद हो गया। उसने मीठी-मीठी बातें की। हल्की-हल्की मुस्कान बिखेरी। मेरा भरोसा जीतने लगी। मेरे जीवन में प्रथम बार स्त्री के आगमन पर मैं अतीव प्रसन्न हुआ। ऐसा प्रसन्न हुआ जैसे जौहरी को मुफ्त में हीरा मिल गया हो।

उस पर पूर्ण भरोसा कायम रखने के लिये मैंने नोटों की गड्डियां थमा दी। वह महिला प्रेमपूर्वक समर्पण भाव दिखाया। मैं भी भावना में बह गया। भावना का प्रवाह इतना तीव्र था। मैं इस किनारे से उस किनारे तक पहुँच गया। इस प्रवाह में कई डुबकियां लगा डाली।

वह महिला गौरवर्ण से युक्त थी। सुंदरता से परिपूर्ण थी। नयनों में काजल लगे थे। बालों की चमक इतनी थी कि हीरा की चमक भी नहीं प्राप्त कर सकता है। दिव्य ज्योति मस्तक पर नजर आ रहा था। उसके होठों की लालिमा और मंद-मंद, मधुर-मधुर मुस्कान लिये हुए एक सुंदर छवि सी लग रही थी। ऐसी सुंदरता पर बडे़-बडे़ ऋषि, मुनि, ज्ञानी हजारो बार अपने को न्योछावर कर सकते हैं।

मैं भी उसकी सौंदर्य से युक्त योग्यता पर समर्पित हो चुका था। उसने मेरे हाथों को नरम-नरम अंगुलियों से स्पर्श किया। ऐसी दशा मेरी हो गयी थी जैसे मैं‌ शिथिल करने वाली दवा का सेवन कर लिया हूँ।

उसके स्पर्श मात्र से मैं एक गहरी निद्रा में सो गया। उस भरोसे से युक्त महिला ने मेरी सोने की चेन,अंगुठी और सोने की घड़ी सब लेकर चम्पत हो गयी। सब घर चले गये। हम वही जमकर सोये। जब जगा तब तक सब बर्बाद कर चुका था।

…..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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