मैं बहुत बड़ा स्वार्थी हूं,दुःख नहीं बांटता किसी को भी !
मैं मेरी समझ संपदा अपनी,रखता पास खुदी के ही,
क्यों कर दूं और किसी को,मिला मुझे मैं ही भोगूं,
गारंटी ईश्वर की इसमें,आएगा बाद में सुख तो भी।।
उसके बनाए नियम सारे,रत्ती भर न फिसलेंगे,
हम हम मोह में फंस करके, इसमें ही घिसलेगे,
चैलेंज नहीं अच्छा होता, प्रतिवाद जरूरी न जब हो,
अन्यथा अंत गड़बड़ ही होगा,शेष काल तक बिलखेगे।।
नफ़रत की दीवारें तोड़ें,चैन तभी मिल पाएगा,
बात बात पर खीझें न,मन कभी नहीं खिल पाएगा
टूटन सदा रहेगी हाबी,लाख जतन कर लें प्राणी,
पड़ेगी मार समय की जब,तब मुंह तेरा सिर जाएगा।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश




