
मौन की व्यथा को, समझना चाहता हूं ।
मौन रहकर तुमसे , कुछ कहना चाहता हूं।।
जो लिखे थे खत कभी, तुमको लगे वो मौन है।
पूछते है मुझसे वहीं ,अब हम तुम्हारे कौन है ??
जा रहे थे तुम हमें जब, छोड़कर हंसते हुए ।
आंखों से मौन आंसू , कहते रहे कुछ बहते हुए ।।
मौन को तुम क्या समझते, मौन सब कुछ बोलता ?
मौन हर इन्सान को, बोले बिना ही तौलता।।
मौन क्या है बुद्ध ने, सबको बताया मौन से ?
जीतने वाले दुनिया को, जीत लेते मौन से।।
जब कभी दिल की बातें, होंठों पर आकर रूकें ।
और खामोशी के आलम में, अश्क पलकों पर दिखे।।
होंठ हो बैचेन और ,खुल सकें ना वो कभी।
मौन की परिभाषा को, कोई तो समझे कभी ।।
लूट गई इज्जत और, मौन का ताला लगा।
[ ] ताकत के सामने ,कमजोर हर साला लगा।।
मर गया भूखा कोई ,बस मौन लेकर साथ में ।
लूट गई दुनिया किसी की, मौन निकला हाथ में ।।
मौन की खामोशी, चीर देती हर आवाज़ को ।
मौन ‘सागर’ चुभे ,महफ़िल के बजते साज को।।
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मूल रचनाकार-
बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश सागर
गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज
Email… nsnareshsagar1@gmail.com




