
हर मानव के चरण आज
कचरों के घर में बंदी है।
मिट्टी की खुशबू भूल गए,
जलवायु हुआ अब गंदी है।
गांव बदल तो गया नगर में,
खेतों से खुशबू भी गुल हो गए।
जंगल भी वीरान हो गए,
कितने खड़े मकान हो गए।
हम घुटते हैं स्वस्थ पवन बिन,
वृक्ष काटकर फर्नीचर बन गए।
वाहन की दुआ से पीड़ित,
प्रदूषित वातावरण हो गए।
आई फिर सावन की बारिश,
कोई खुशबू मिट्टी से आने लगी।
हमारा बचपन भी क्या खूब था,
अपने गांव की मिट्टी मन को लुभाने लगी।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




