
सूरज चांद का जो अल्हेदा मजहब होता
तो किसका ईश्वर किसका रब होता।
कोई तो सुलझाये ये अबूझ पहेली
दूजे मजहब के दर कब सबेरा होता।
किस आंगन को रौशन करती चांदनी
किसके घर पर स्याह अंधेरा होता।
अगर जो बंट जाता हवा और पानी
तो मजहबी का श्मशान मे डेरा होता।
न मजहब है निवाला,न मजहब है जिंदगी
काश हम इंसान होते,तो न तेरा मेरा होता।
सुभाष हेमबाबू ” नादान ”
महोबा




