आलेख

पंच-कुन: एक खिलौने की गोद में मां की ममता तलाशता नन्हा बंदर

महेन्द्र तिवारी

जापान के इचिकावा सिटी जूलॉजिकल एंड बॉटनिकल गार्डन्स की चहारदीवारी के भीतर जन्मा एक नन्हा जापानी मैकाक, जिसे दुनिया आज ‘पंच-कुन’ के नाम से जानती है, आधुनिक समय में जीव संवेदनाओं और प्राकृतिक संघर्ष की एक जीवंत मिसाल बनकर उभरा है। जुलाई 2025 में जब इस नन्हे बंदर ने पहली बार अपनी आँखें खोली होंगी, तो उसने एक ऐसे सामाजिक ढांचे की उम्मीद की होगी जहाँ मां की गर्माहट और समूह की सुरक्षा सर्वोपरि होती है, लेकिन नियति ने उसके लिए एक अलग ही पटकथा लिख रखी थी। जन्म के कुछ ही घंटों बाद उसकी मां द्वारा उसे त्याग दिए जाने की घटना ने न केवल चिड़ियाघर के प्रशासन को चौंकाया, बल्कि वन्यजीव प्रेमियों के बीच एक गहरी चिंता भी पैदा कर दी। जापानी मैकाक, जिन्हें हम अक्सर ‘स्नो मंकी’ के रूप में जानते हैं, अपनी जटिल सामाजिक संरचना और मां-बच्चे के अटूट बंधन के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसे में एक नवजात का अनाथ हो जाना उसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देता है। पंच-कुन की कहानी यहीं से एक भावनात्मक मोड़ लेती है जब चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने उसके जीवन में एक ‘सरोगेट मदर’ के रूप में एक निर्जीव स्टफ्ड ऑरंगुटान खिलौने को शामिल किया। यह खिलौना देखते ही देखते पंच की दुनिया का केंद्र बन गया, और यहीं से शुरू हुई एक ऐसी यात्रा जिसने इंटरनेट पर लाखों लोगों की आंखों को नम कर दिया।
पंच-कुन और उसके इस भूरे रंग के खिलौने के बीच का बंधन केवल एक तस्वीर या वीडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राइमेट मनोविज्ञान के उन गहरे रहस्यों को उजागर करता है जिन्हें दशकों पहले मनोवैज्ञानिक हैरी हार्लो ने अपने प्रयोगों में सिद्ध किया था। हार्लो के प्रयोगों ने दिखाया था कि एक बच्चा बंदर भोजन देने वाली कठोर तार की मां के बजाय रेशमी कपड़े वाली मां को चुनता है, क्योंकि जीवों के लिए शारीरिक पोषण से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भावनात्मक सुरक्षा और स्पर्श का सुख होता है। पंच-कुन के मामले में भी यही हुआ। वह नन्हा बंदर अपने इस खिलौने को महज़ एक वस्तु नहीं मानता, बल्कि वह उसे हर जगह अपने साथ लेकर घूमता है। जब वह खाता है, तो खिलौना उसके पास होता है; जब वह सोता है, तो वह उसे अपनी छाती से सटाकर रखता है; और जब वह डरता है, तो वह उसी बेजान कपड़े के टुकड़े में अपनी जान तलाशता है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में जब हम पंच को अपने से लगभग दोगुने बड़े खिलौने को घसीटते हुए या उसे गोद में उठाकर चलते हुए देखते हैं, तो वह दृश्य सहज ही मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देता है। यह हमें याद दिलाता है कि मां का अभाव किसी भी प्रजाति के लिए कितना बड़ा शून्य पैदा कर देता है।
जैसे-जैसे पंच-कुन बड़ा हो रहा है, चिड़ियाघर के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसे वापस उसके अपने समाज यानी बंदरों के समूह में एकीकृत करने की है। हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो ने इस प्रक्रिया की जटिलता और क्रूरता के दावों को जन्म दिया, जब पंच को एक वयस्क मादा बंदर द्वारा डांटते और घसीटते हुए देखा गया। इंटरनेट पर कई लोगों ने इसे पशु क्रूरता करार दिया, लेकिन यदि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो यह पंच के सामाजीकरण का एक अनिवार्य हिस्सा था। चिड़ियाघर के विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पंच जब समूह के दूसरे बच्चों के पास जाने की कोशिश करता है, तो उसे अभी तक सामाजिक संकेतों की समझ नहीं है। एक मां के बिना पले बढ़े होने के कारण उसे यह नहीं पता कि कब रुकना है और कब दूरी बनाए रखनी है। जब वह किसी दूसरे बच्चे के पास गया और उस बच्चे की मां ने उसे दूर धकेला, तो वह वास्तव में बंदरों के समाज का ‘अनुशासन’ था। यह अनुशासन ही उसे भविष्य में एक स्वतंत्र और सशक्त वयस्क बंदर बनाने में मदद करेगा। हालांकि, उस डांट के बाद पंच का तुरंत भागकर अपने ऑरंगुटान खिलौने से लिपट जाना यह दर्शाता है कि वह अभी भी भावनात्मक रूप से कितना कमजोर है और वह खिलौना उसके लिए एक सुरक्षित पनाहगाह की तरह काम कर रहा है।
इस पूरी घटना ने ‘अटैचमेंट थ्योरी’ और ‘ट्रांजिशनल ऑब्जेक्ट्स’ जैसे मनोवैज्ञानिक विषयों पर एक नई बहस छेड़ दी है। जिस तरह मानव शिशु अपने माता-पिता की अनुपस्थिति में किसी कंबल या टेडी बियर से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं ताकि उन्हें सुरक्षा का एहसास हो, पंच-कुन भी उसी दौर से गुजर रहा है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि क्या मानवीय हस्तक्षेप और खिलौनों का यह सहारा उसे प्राकृतिक रूप से सक्षम बना पाएगा? इचिकावा चिड़ियाघर का स्टाफ इस दिशा में बेहद संवेदनशीलता से काम कर रहा है। वे ‘सॉफ्ट रिलीज’ की प्रक्रिया अपना रहे हैं, जहाँ पंच को धीरे-धीरे समूह के साथ रहने का समय दिया जाता है ताकि वह खिलौने पर अपनी निर्भरता कम कर सके। यह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है, क्योंकि एक बंदर जो अपनी शुरुआती महीनों में बंदरों की भाषा नहीं सीख पाता, उसे बाद में समूह का हिस्सा बनने में काफी संघर्ष करना पड़ता है। पंच की कहानी केवल एक अनाथ बंदर की कहानी नहीं है, बल्कि यह वर्तमान समय में हमारे अपने बच्चों और समाज की स्थिति का भी प्रतिबिंब है। जिस तरह पंच एक डिजिटल और कृत्रिम दुनिया में अपने खिलौने में मां को तलाश रहा है, कहीं न कहीं आधुनिक मानव समाज भी असली भावनात्मक जुड़ाव की जगह गैजेट्स और निर्जीव वस्तुओं में सांत्वना खोज रहा है।
पंच-कुन की इस लोकप्रियता ने वन्यजीव संरक्षण और चिड़ियाघरों की भूमिका पर भी सकारात्मक प्रकाश डाला है। अक्सर चिड़ियाघरों को जानवरों को कैद करने वाली जगह के रूप में देखा जाता है, लेकिन पंच जैसे मामलों में ये संस्थान जीवन रक्षक की भूमिका निभाते हैं। यदि चिड़ियाघर के कीपर्स ने हस्तक्षेप न किया होता, तो पंच अपनी मां के त्याग के कुछ ही घंटों बाद दम तोड़ देता। आज वह सुरक्षित है, स्वस्थ है और दुनिया भर के लोगों के लिए सहानुभूति का प्रतीक बना हुआ है। उसके माध्यम से लोग जापानी मैकाक प्रजाति के बारे में जान रहे हैं और उनके संरक्षण की आवश्यकता को समझ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते शहरीकरण के कारण इन बंदरों के प्राकृतिक आवास कम हो रहे हैं, जिससे उनके व्यवहार में तनाव और इस तरह की घटनाएं (मां द्वारा बच्चे को छोड़ना) बढ़ सकती हैं। पंच की कहानी हमें यह संदेश देती है कि प्रकृति में हर जीव को प्यार और सुरक्षा की आवश्यकता होती है, और जब प्रकृति अपना हाथ खींच लेती है, तो करुणा ही वह सेतु बनती है जो जीवन को बचाए रखती है।
अंततः, पंच-कुन की यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। वह हर दिन सीख रहा है, गिर रहा है और फिर से संभल रहा है। उसका वह ऑरंगुटान खिलौना शायद कुछ समय बाद पुराना होकर फट जाए या उसे समूह के दबाव में छोड़ना पड़े, लेकिन उस खिलौने ने उसे वह प्रारंभिक आत्मविश्वास दिया है जो उसे जीने के लिए चाहिए था। यह कहानी हमें सिखाती है कि करुणा किसी भाषा या प्रजाति की मोहताज नहीं होती। एक बेजान खिलौना भी एक मरते हुए जीव के लिए संजीवनी बन सकता है। भविष्य में जब पंच-कुन पूरी तरह से अपने समूह का हिस्सा बन जाएगा और शायद अपने खिलौने को पीछे छोड़ देगा, तब भी उसकी यह संघर्ष गाथा दुनिया को यह याद दिलाती रहेगी कि कठिन से कठिन समय में भी अगर सहारा मिल जाए, तो जीवन फिर से मुस्कुरा सकता है। पंच-कुन आज केवल जापान का सितारा नहीं है, बल्कि वह उन सभी के लिए आशा की एक किरण है जो अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहे हैं और किसी न किसी रूप में अपनी ‘सुरक्षित पनाहगाह’ की तलाश में हैं। उसकी मासूमियत और उसके अटूट बंधन ने यह साबित कर दिया है कि संवेदनाएं ही ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली कड़ी हैं।

*महेन्द्र तिवारी,नई दिल्ली*

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