साहित्य

संवरने लगे हैं

भारती शर्मा..”फ़िरदौस “

थिरकती फिजाओं में उलझने लगे हैं
के बाहों में उनकी…. सिमटने लगे हैं

जमाना पलट कर मुझे देखता है
के नजरों में उनके अखरने लगे हैं

उतर आई घर में मिरे चाँदनी भी
के यादों में उनकी पिघलने लगे हैं

बिछुड कर के तुम से कहीं खो गये थे
मिले हो जो फिर से महकने लगे हैं

हवा के बदन से लिपट जाऊगी मैं
महक तेरी लेकर बहकने लगे हैं

नजर भर के जब से देखा है तुमको
कदम खुद बखुद ही बहकने लगे हैं

सुनो जान लेगी खमोशी तुम्हारी
के खुद को ही खुद हम अखरने लगे हैं

मुहब्बत हुई है मेहरबान जब से
बिखरते बिखरते संवरने लगे हैं

भारती शर्मा..”फ़िरदौस “

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