
शिव शंकर के द्वारे गूंँजें भक्ति भाव उद्गार।
श्रद्धा से जो शीश झुकाता, होता भाव से पार।।
शुभ त्रिपुंड मस्तक पर सोहे, कर त्रिशूल है शस्त्र।
अर्ध चंद्रमा भाल विराजे ,करें दुष्ट को त्रस्त।।
शीश जटा से निर्मल पावन, बहती गंगा धार।
सोमवार प्रिय दिवस लगे हैं, पूजन करिए नित्य।
सब देवों में चमक रहे शिव, जैसे नभ आदित्य।।
कटि में है बाघम्बर पहने, गले सर्प का हार।
कावड़ लिए भक्त हैं आए,चल कर राहें दूर।
धन्य सफल जीवन हो जाता, खुशी मिले भरपूर।
मनवांछित फल देते भोले, भक्त करें जयकार।।
अजर अमर अविनाशी भोले, चढ़े धतूरा भांँग।
पूजन अर्चन वंदन करके, भक्त रहे वर मांँग।।
बेलपत्र अक्षत गंगाजल, प्रभु करते स्वीकार।
ढोल नगाड़े बाजे बजते, शहनाई है संग।
भूत प्रेत सब चले बराती, देख सभी है दंग।।
परिणय उत्सव शिव गौरा का, मना रहा संसार।
हृदय बसाई मूर्ति तुम्हारी जिसकी सुखद सुवास।
सकल हारो संताप जगत का पूर्ण करो मम आस।।
वरद हस्त गीता पर रख दो आई बाबा द्वार।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश
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