साहित्य
ये जात पात के बंधन तोड़ो

ये जात–पात के बंधन तोड़ो,
इंसान को इंसान से जोड़ो।
माटी एक, हवा भी एक,
क्यों दिल में दीवारें छोड़ो।
खून का रंग न बदला कभी,
फिर भेद कहाँ से आया है?
नाम बदलते, रूप बदलते,
पर दर्द तो वही पराया है।
मंदिर–मस्जिद, गली–चौबारे,
सबने एक सा गीत गाया है,
फिर ऊँच–नीच की बातों ने
क्यों भाई को भाई भुलाया है!
ना जात बड़ी, ना धर्म बड़ा,
बस कर्म बड़ा कहलाता है,
जो बाँट सके थोड़ा सा सुख,
वही तो सच्चा कहलाता है।
आओ मिलकर कसम ये खाएँ,
हर दिल में दीप जलाएँ,
जात–पात के सारे बंधन
आज यहीं दफन कर जाएँ।
हाथ में हाथ, सुर में सुर हो,
एक नई दुनिया गुनगुनाएँ,
इंसान–इंसान का रिश्ता
सबसे ऊपर लिख जाएँ।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश



