
साम,दाम,दंड,भेद से आपके हाथों में जनसत्ता, धनसत्ता, धर्मसत्ता, मीडिया सत्ता और राजसत्ता को बरगलाने का कौशल है,तो आप राक्षस बनकर बर्बादी और विनाश को संपन्न कर सकते हैं तथा देवता बनकर सेवा भी कर सकते हैं। सदुपयोग और दुरुपयोग आप पर निर्भर है। यदि आपकी शिक्षा, दीक्षा, परीक्षा एकतरफा भौतिकवादी परिवेश और विचारधारा में हुई है,तो निश्चित जानिये कि आपका व्यवहार राक्षसी हो ही जाना है। लेकिन यदि आपकी विचारधारा एकांगी न होकर भौतिकवादी संग अध्यात्मवादी है,तो फिर आपका देवता बन जाना निश्चित है।आज क्या पूर्व और क्या पश्चिम,क्या भारत और क्या यूरोप तथा क्या भारत और क्या अरब देश-अधिकांश देश राक्षसी और दानवी बनते जा रहे हैं। उच्च- शिक्षित लोगों के अधिकांश निर्णय और निष्कर्ष फिसड्डी सिद्ध हो रहे है ।
1).ग्लोबल विलेज के जितने फायदे गिनाए जा रहे थे, अमरीका -इजरायल -इरान युद्ध से अब लग रहा है कि उसके नुकसान कयी गुना अधिक हैं।यदि विज्ञान और तकनीक के लाभ वैश्विक होते हैं तो नुकसान में वैश्विक ही होते हैं। उपग्रह आधारित संचार और सूचना तकनीक, हाईब्रिड बीज, ऊर्जा आवश्यकताएं, रेल और हवाई परिवहन, तीव्र प्रभावकारी चिकित्सकीय औषधियां- वैक्सीन -ई़ंजैक्शन-चीरफाड, बड़े बड़े विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान, कोयला -परमाणु-सोलर ऊर्जा उत्पादन तथा युद्धों में विनाश करने के लिये परमाणु -हाइड्रोजन-जैविक -बारुद-मिसाईल-युद्धक विमान -राडार -ड्रोन आदि हथियार तकनीक के दुष्परिणाम भी स्थानीय न होकर वैश्विक ही होते हैं। यह ग्लोबल विलेज का ही चमत्कार हैं कि भोजन और भूखमरी संकट, घातक महामारियों की मार,तेल और गैस संकट, चिकित्सा और औषध संकट, शिक्षा और शोध संकट, परिवहन संकट, ऊर्जा और बिजली संकट, पेयजल और सिंचाई जल संकट भी सारी धरती को प्रभावित करते हैं। पीछे कोविड के कारण लगाये गये लाकडाऊन से जो सारी धरती प्रभावित हुई थी।पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया था। लाखों लोग मारे गये थे।वैसी ही वैश्विक संकट की विषम स्थिति अमरीका इजरायल इरान युद्ध के कारण पैदा होने वाली है। बड़बोले और दिशाहीन स्वार्थी नेता हाथ खड़े कर देंगे।भूख, प्यास, बिमारी,बेरोजगारी के कारण जनता जनार्दन का संहार होगा।सारी धरती की यही हालत है।
2.) दुनिया की दबंग महाशक्तियां गरीब देशों की सुरक्षा की जो गारंटी लेती हैं,अब उनका भी भांडाफोड हो गया है। इजरायल और अमरीका के आयरन डोम,इंटरसैप्टर, राडार आदि टैक्नोलॉजी में एक फिसड्डी देश ईरान के सामने बौने सिद्ध हो रहे हैं।इस युद्ध ने फिर से युद्ध की परिभाषा, युद्ध की तैयारी, युद्ध का संचालन और परीक्षा परिणाम को आमूल बदलाव करके रख छोड़ा है। अरबों के हथियार व्यर्थ हो रहे हैं,जबकि लाखों के हथियार विनाश कर रहे हैं। अमरीका और इजरायल इरान के सामने विस्मृत से खडे हैं और इस युद्ध से छूटकारा पाने के लिये छटपटा रहे हैं। मुसीबत में पडने पर कोई भी व्यक्ति, संगठन या देश पहले अपना खुद का बचाव करते हैं,बाद में अन्यों को बचाने की सोचते हैं।यूरोप के अधिकांश देश तथा जापान आदि ने अमरीका को ठेंगा दिखा दिया है। अमरीका ने खाडी के देशों को सुरक्षा देने की बात कहकर इन देशों में अपने युद्धक ठिकाने बना रखे हैं। लेकिन इरान के कहर से अमरीका खाड़ी देशों की रक्षा करने में पंगू सिद्ध हुआ है।अब तो कच्चे तेल के भंडारों से संपन्न खाड़ी के देशों को अमरीका से नाता तोड़कर अपनी रक्षा के इंतजाम खुद करने चाहियें। अपनी मजहबी पुस्तक को परे रखकर अब तो तर्क और विचार से काम लेना शुरू करो। कुछ दर्शनशास्त्र का पढना -पढाना शुरू करो।
3.) राष्ट्रीय संकट के समय पर चुप्पी साध लेना या हाथ खड़े कर देना या मैदान छोड़कर भाग जाने की भारतीय नेताओं की प्रवृत्ति का एक बार फिर से प्रदर्शन हुआ है। बहुसंख्यक जनमानस मरे,रोये, बर्बाद हो, भूखों मरे – नेताओं को इससे कोई लेना-देना नहीं है।इस समय रसोई गैस के लिये पूरा देश लंबी -लंबी लाइनों में लगा खड़ा है। गैस के दाम बढा दिये हैं।आगे गैस,डिजल, पैट्रोल के भाव बढ़ने की पूरी संभावना है।इस अखिल भारतीय संकट के बावजूद भी आपातकाल के लिये हमारी सरकार अब तक कोई योजना नहीं बन सकी है। लगता है कि भारत फिर से गांवों की तरफ जाने को मजबूर होगा।चुल्हा, गोबर,लकड़ी,उपले आदि फिर से हमारे जीवन में घुसपैठ करने वाले हैं। बड़े -बड़े दावे तो भारत को विश्वगुरु बनाने के लेकिन जमीनी वास्तविकता घोर पिछड़ेपन की पूरे भारत में देखने को मिल रही है।
4.) जनमानस की मूलभूत सुविधाओं से आंखें बंद कर लेने वाले नेताओं के पास एक माईंडवाश करने वालों की पूरी की परी फौज होती है। यदि उन अंधभक्तों के नेता देश को भी बेच दें, बर्बाद कर दें, महंगाई बढ़ा दें, विदेशों के सामने घुटने टेक दें, बलात्कार करते पकड़े जायें,देश से गद्दारी करते मिल जायें तो भी इन अंधभक्तों की फौज को कोई फर्क नहीं पड़ता है। ये अपने आराध्य नेता की जय जयकार करते रहेंगे।राष्ट्रप्रेमियों को राष्ट्रद्रोही घोषित करने की काबिलियत इस अंधभक्तों की फौज के पास बहुतायत से होती है।ये ऊपर से खुद को राष्ट्र, धर्म, संस्कृति हितैषी दिखलाते हैं, लेकिन भीतर भीतर ये सभी कुकृत्य करते हैं। अमरीका -इजरायल – ईरान युद्ध में हमारे नेताओं की भीरु,पलायनवादी और विश्वासघाती प्रवृत्ति हर तरफ दिखाई पड़ रही है।
5.) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के अवसर पर चतुरंगिणी सेना की अवधारणा को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी द्वारा फिर से शुरू करने की घोषणा की गई है। पहले के युगों में सेना के चार विभाग हाथी,घोड़े,पैदल और रथ होते थे।एक अक्षौहिणी में सैनिकों की कुल संख्या 218700 होती थी। महाभारत युद्ध में 18 अक्षौहिणी सेना थी – 11कौरवों के पास तथा 7 पांडवों के पास। रथों की संख्या 21870, हाथियों की संख्या 21870, घोड़ों की संख्या 66610 तथा पैदल सैनिकों की संख्या 109350 होती थी। महाभारत युद्ध में लडने वाले सैनिकों की कुल संख्या
3936600 थी।यह आज से इक्यावन सदी पहले के भारतवर्ष की रक्षा सेना की धूंधली सी तस्वीर है। ध्यान रहे कि इस युद्ध में केवल थल सेना का प्रयोग हुआ था,जलसेना और वायुसेना का नहीं।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने गौमाता, सनातन धर्म और संस्कृति, सनातनी जीवन-मूल्यों, सनातनी पूजा-स्थलों और तीर्थस्थलों तथा निर्बलों आदि की रक्षा के लिये विभिन्न विषयों के आधिकारिक विद्वान 27 व्यक्तियों का चुनाव किया है।अगले माघ स्नान तक यानी फरवरी 2027 से इस योजना पर गंभीरता से काम किया जायेगा। इसमें चारों वर्णों के व्यक्ति सम्मिलित हो सकेंगे।यह चतुरंगिणी सेना भगवान् परशुराम से प्रेरित है।इसके सदस्य कानून अनुसार फरसा, खड्ग, लाठी,बंदूक आदि धारण कर सकेंगे।इस सेना का उद्घोष होगा -‘रोको,टोको और ठोको’। स्वयं शंकराचार्य अपने नियुक्त व्यक्तियों के द्वारा इस सेना का संचालन करेंगे।
शंकराचार्य की सेना बनाने की यह सोच तो बहुत बढ़िया है। लेकिन शंकराचार्य कितनी सक्रियता से इस योजना पर काम करते हैं,इसी से इसकी सफलता और विफलता का आंकलन होगा।इस चतुरंगिणी सेना के निर्माण के लिये जन,धन,तन और मन – इन चारों का सहयोग लिये जाने आवश्यकता पड़ेगी। कार्यकर्ताओं द्वारा यह आवश्यकता पूरी की जायेगी।कयी सदियों पश्चात् किसी शंकराचार्य द्वारा इस प्रकार का निर्णय लिया जाना सनातन धर्म और संस्कृति के लिये एक सकारात्मक और उत्साहवर्धक संकेत है।
उपनिषद् शैली में दीक्षांत समारोह केवलमात्र आयोजित करने की घोषणा मात्र से कुछ भी बदलाव नहीं होने वाला। जमीनी वास्तविकता तो पूरी तरह से बिल्कुल सनातन विरोधी सडी- गली अब्राहमिक है।
6.) विश्वविद्यालयों में अधिकांश विभागों में शिक्षक नहीं हैं। पंद्रह पंद्रह वर्षों से ठेके के शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है।ये ठेके के शिक्षक बंधुवा मजदूरों की तरह मामूली वेतन में काम करने को विवश हैं।पूरे भवन नहीं हैं, और जो भवन मौजूद हैं वो जर्जर हालत में हैं।प्रयोगशालाएं नहीं हैं।थोडे बहुत जो शिक्षक मौजूद होते हैं-उन द्वारा कक्षाएं नहीं ली जाती हैं। विश्वविद्यालयों को राजनीति के अड्डे बना दिया गया है।विश्वविद्यालयों में कक्षाओं से अधिक राजनीतिक सभाएं होती हैं। एक संगठन विशेष के अनपढ़ समान लोगों को कुलगुरू लगाकर इनके भी ऊपर और भी अधिक अनपढ़ों को बैठाया जा रहा है।एक अपंजीकृत संगठन के गैर- अनुभवी और राजनीतिक लोगों को प्रोफेसर आफ प्रैक्टिस लगाकर विश्वविद्यालयों का बेड़ा गर्क किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में वैचारिक स्वतन्त्रता समाप्त कर दी गई है। विश्वविद्यालयों में शिक्षकों शोधार्थियों और छात्रों की अपेक्षा बाहरी आवारा तत्वों की आवारगी चरम पर रहती है। पुस्तकालयों में विषय से संबंधित स्तरीय पुस्तकों की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा का भरा हुआ दिखाई देता है। खेलों की तरफ ध्यान न के बराबर है। लेकिन अपनी निजी मेहनत से मैडल पाने पर विश्वविद्यालय अधिकारी फोटो खिंचवाने के लिये सबसे आगे रहते हैं। परीक्षा परिणाम, अंकतालिका और उपाधि लेने के लिये विद्यार्थी महीनों चक्कर काटने को विवश होते देखे जा सकते हैं। विश्वविद्यालयों में जिज्ञासा, प्रश्न, संदेह,तर्क, विचार, चिंतन और विमर्श को जगाने वाले विषय ‘दर्शनशास्त्र’ सर्वाधिक बुरे हालात हो रहे हैं। ऐसे विषम हालात में कैसा उपनिषद् काल का दीक्षांत समारोह? ऐसे में आजकल के विद्यार्थियों के लिये सनातनी गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था के दीक्षांत समारोह की डींगें मारना किसी काम की नहीं है।
7.) महाभारत युद्ध से भी कयी हजार वर्षों पहले की रचना ‘तैत्तिरीय उपनिषद्’ की शिक्षा वल्ली को ध्यान से पढ तो लो। आखिर गुरुकुल से शिक्षा पूरी कर लेने के पश्चात् गृहस्थ जीवन में जाते हुये विद्यार्थियों के लिये गुरुकुल के आचार्य ने क्या उपदेश किया है? आजकल के शिक्षकों,प्राचार्यों, कुलसचिवों और कुलगुरुओं के आचरण में तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षा वल्ली में बतलाये गये किसी गुण के दर्शन नहीं होते हैं।इनका जीवन घोर उच्छृंखल कामुकता,लोभ, चापलूसी,द्वेष, ईर्ष्या, बदले की भावना,आलस्य, अहंकार, कर्तव्य पलायन,धन लौलुपता,अति संग्रह वृत्ति और पद -प्रतिष्ठा की महत्वाकांक्षा से भरा हुआ जान पड़ता है।
8.) यदि केवल सत्यनिष्ठा,पुरुषार्थ और निज प्रतिभा से जिंदगी को जीओगे तो मालूम होगा कि जिंदगी कितनी तकलीफदेह, बदसूरत, बदसलूक और संघर्षभरी है। जिंदगी किसी कवि की कोई कविता नहीं है। जिंदगी किसी निबंधकार का कोई निबंध नहीं है। जिंदगी किसी उपन्यासकार का कोई उपन्यास नहीं है। जिंदगी न महाकाव्य है तथा न ही कोई खंडकाव्य है। जिंदगी इन सबसे अलग सी, जिंदगी इन सबसे दूर सी, जिंदगी इन सबसे सहमी सी और इन सबसे परे सी है। कोई कवि,लेखक, रचनाकार, निबंधकार, उपन्यासकार आदि खुद की जिंदगी को ही अपनी रचनाओं में पूरी तरह से अभिव्यक्त नहीं कर पाता है,तो फिर अन्यों की जिंदगी के बारे में क्या ख़ाक बतलायेगा?बस, खोपड़ी में थोड़ी सी खुजली हुई और उसे बाहर निकाल दिया। किसी साहित्यकार की कोई रचना बेशक किसी सहृदय पाठक को कुछ पल के लिये झकझोर दे, लेकिन उसकी निजी जिंदगी को बयान नहीं कर सकती है।हरेक व्यक्ति की अपनी निजी जिंदगी होती है, निजी समस्याएं होती हैं,निजी परिस्थितियां होती हैं तथा निजी अभिव्यक्ति के साधन होते हैं।ये सब मिलकर भी किसी की जिंदगी को बयान नहीं कर सकते हैं।बस किसी दीपक की लौ की तरह, किसी लड़की में सुलगती ज्वाला की तरह, किसी शमशान में शव में उठती लपटों की तरह जलते रहो,सिसकते रहो, रोते रहो, आहें भरते रहो।खुद के द्वारा,खुद से ही,खुद के लिये,खुद की ही जिंदगी -बाकियों के लिये उनकी खुद की जिंदगी। यहां इस संसार रुपी समुद्र में सभी व्यक्ति टापुओं की तरह से रह रहे हैं। वास्तव में कोई किसी से नहीं मिलता है। किसी का किसी से कोई मिलन नहीं होता है।हां, मिलना का भ्रम अवश्य होता है।
9.) अंतरराष्ट्रीय व्यापार की धूर्तता संसार को सुखी और समृद्ध नहीं होने देगी। संसार की महाशक्तियां अमरीका,रुस, चीन आदि तथा इनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसी भी नैतिकता, धार्मिकता और जीओ और जीने दो की जीवन-शैली को नहीं मानते हैं। इनके लिये धन दौलत कमाकर दुनिया पर शासन करना मुख्य लक्ष्य होता है। बेशक ये किसी धर्म, नैतिकता आदि को नहीं मानते हों, लेकिन अपने व्यापारिक हितों के लिये ये धर्म और नैतिकता का ही सहारा लेते हैं।इसके लिये धर्माचार्यों,लेखकों, साहित्यकारों,वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, शिक्षाविदों,कृषि विशेषज्ञों,प्रबंधकों, टीवी चैनल और सोशल मीडिया को खरीद लेते हैं। मेहनतकश जनमानस को इनकी लूटपाट की कुनीति कभी भी समझ में नहीं आयेगी।जब पहले वाली समझ में आ जायेगी तो फिर ये नये नये हथकंडे खोज लेते हैं।बस,इसीलिये इनका लूटपाट,खरीद फरोख्त और अत्याचार और शोषण का सिलसिला चलता रहा है। युद्ध को ही ले लो। युद्धों और फिर शांति स्थापित करने का इनका प्रोपेगैंडा भी इनके व्यापारिक हितों से जुड़ा हुआ होता है। युद्धों से दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा कर लेते हैं और युद्ध के पश्चात् असुरक्षित महसूस कर देशों को अपने हथियारों को बेचकर धन दौलत कमाते हैं।हर युद्ध के पश्चात् अरबों खरबों डालर के हथियार समझौते होते हैं।इस समय अमरीका -इजरायल- इरान युद्ध रुकने के बाद में खाडी के सभी देश जमकर हथियारों की खरीद करके अपनी सुरक्षा का प्रबंध करने को प्रयासरत दिखेंगे। पिछले 200 वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है। ध्यान रहे कि जो लोग यह प्रचारित करते हैं कि शिक्षा, विज्ञान और आधुनिकता मनुष्य को समझदार बनाते हैं – यह कथन बिल्कुल झूठ है। वास्तविकता तो यह है कि उच्च -शिक्षित वैज्ञानिक,लेखक, साहित्यकार, शिक्षाविद्, चिकित्सक,प्रबंधक, धर्मगुरु और व्यापारिक घराने ही युद्ध पिपासु महाशक्तियों और हथियार निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मददगार बनते हैं। सच्चाई तो यह है कि जब तक आर्य वैदिक सनातन धर्म और संस्कृति के अनुसार किसी व्यक्ति का आत्मिक -आध्यात्मिक -आंतरिक विकास होकर उसमें संवेदनशीलता, करुणा,विवेक, जागरुकता,होश आदि का जन्म नहीं होगा,तब तक भौतिक- सांसारिक- वैज्ञानिक रुप से उच्च- शिक्षित होना इस धरती के लिये विनाश का कारण बनता रहेगा। आधुनिक उच्च -शिक्षित वर्ग ही इस सुंदर धरती ग्रह के लिये अभिशाप बन चुका है। अनपढ़- गंवार -देहाती-अशिक्षित कहे जाने वाले धरती के नागरिकों ने इस धरती का कोई नुक़सान नहीं किया है। ज्ञान के साथ में यदि विवेक नहीं होगा तो विनाश सुनिश्चित है। शक्ति के साथ में यदि होश नहीं होगा तो शांति स्थापना नहीं हो सकती है। शिक्षा के साथ में यदि करुणा नहीं होगी तो युद्ध होते रहेंगे। आज दुनिया के बड़े -बड़े विश्वविद्यालयों, शिक्षा- केंद्रों, भौतिक -प्रयोगशालाओं, तकनीकी -संस्थानों,योग- केंद्रों, मठों, विहारों आदि में एकतरफा बेढंगे भौतिक विकास की व्यवस्था मौजूद है। व्यक्ति के भीतर छिपी हुई शक्तियों का यदि सदुपयोग पांच प्रतिशत हो रहा है तो दुरुपयोग पिचानवे प्रतिशत हो रहा है। पिछले 200 वर्षों के कालखंड में जितने बदलाव,जितनी क्रांतियां, संघर्ष और आंदोलन हुये हैं,केवल भौतिक समृद्धि के लिये हुये हैं।इनकी बागडोर शायद ही कभी सृजनात्मक,विवेकी, होशपूर्ण लोगों के पास रही होगी। पिछले 200 वर्षों से अब्राहमिक,राक्षसी और दानवी प्रवृत्ति के लोग तुरंत जनसत्ता, धनसत्ता, राजसत्ता,ज्ञानसत्ता पर कब्जा करते आ रहे हैं।
………….
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र- 136119



