
दिल में कई तूफान लिए,
काँधों पर अरमानों की
गठरी लिए,
मुठ्ठी में अरमानों के पोटली
थामे ,
चले जा रहे हैं- जहाँ राह ले
जाए।
दिल , मुठ्ठी और काँधों पर
भले ही बोझ भारी है,
पर आँखों मे उम्मीद का दिया
अब भी कह रहा है।
वही लौ मुझसे कहती है–
रुकना नहीं , थकना नहीं ।
टूट कर भी मुस्कुराना ,और
बढ़ते रहना है कहीं।।
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✍🏼पंकज एस पाण्डेय,
स्वरचित मौलिक–



