साहित्य

अकेलापन

पंकज एस पाण्डेय

दिल में कई तूफान लिए,
काँधों पर अरमानों की
गठरी लिए,
मुठ्ठी में अरमानों के पोटली
थामे ,
चले जा रहे हैं- जहाँ राह ले
जाए।

दिल , मुठ्ठी और काँधों पर
भले ही बोझ भारी है,
पर आँखों मे उम्मीद का दिया
अब भी कह रहा है।

वही लौ मुझसे कहती है–
रुकना नहीं , थकना नहीं ।
टूट कर भी मुस्कुराना ,और
बढ़ते रहना है कहीं।।
***
✍🏼पंकज एस पाण्डेय,
स्वरचित मौलिक–

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