
अंतिम ऊंचाई,,,
ऊंचाइयों का कोई पैमाना नहीं होता,
क्या पहली और क्या अंतिम ऊंचाई?
दिल में उम्मीदों के दीए तब जलते हैं,
जब उसने बहुत चोट होती है खाई।
चोट खाया दिल क्षितिज छूना चाहता,
एक एक कदम सोचकर आगे रखता है।
हर समस्या को हस कर पार करता,
अंतिम ऊंचाई पर पहुंचाना चाहता है।
अंतिम ऊंचाई पर मिलता है सुकून,
दिल हर जख्म को फिर याद करता है।
अंतिम ऊंचाई पर पहुंचने का हो जुनून,
दिन रात फिर उसकी फरियाद करता है।
दिल में जोश और जुनून को लेकर,
बस मंजिल की ओर बढ़ते चलो।
जब तक अंतिम ऊंचाई ना पा लो तुम,
दिए की तरह हरपल बस जलते चलो।
सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र।




