एक लाख दो हजारों द्वारा सराही गई डॉ रामशंकर चंचल की अद्भुत कविता, अकेला होना

देश के इतिहास में मध्य प्रदेश आदिवासी पिछड़े अंचल झाबुआ में जन्म हुआ डॉ रामशंकर चंचल ने अपनी अद्भुत कविता , अकेला होना जो उन्हीं के उम्दा स्वर में सोशल मीडिया पर विश्व पटल पर दस्तक दे आज सम्पूर्ण देश और विश्व में एक लाख दो हजारों द्वारा सुन कर सराही गई है जो कालजयी कविता के रूप में आज स्थापित हो संपूर्ण देश और विश्व में अद्भुत छाई हुई है, विश्व इतिहास में पहली बार हिंदी नई कविता को ऊंचाइयां मिली है आदरणीय डॉ रामशंकर चंचल की अद्भुत प्रस्तुति में चर्चित हो चर्चा बन गई है यह कविता जो प्रकृति प्रेम को ईश्वर उपस्थित का अहसास कराती हुई , बेहद सुखद अहसास कराती हैं और सुख सुकून देता है आज सम्पूर्ण विश्व में चर्चित हो गई है आदिवासी पिछड़े अंचल झाबुआ के डॉ रामशंकर चंचल की यह कविता जो सचमुच वंदनीय हैं जिसने हिंदी साहित्य को ऊंचाइयां दी है और नई कविता को ऊंचाइयां देते हुए स्थापित किया है
झाबुआ आदिवासी पिछड़े अंचल में आजीवन व्यतीत करने वाले डॉ रामशंकर चंचल ने साबित कर दिया कि सृजन यदि ईश्वर कृपा आशीष है तो एक कविता भी कवि को अमर कर देता है
धन्य धरा झाबुआ मध्य प्रदेश आदिवासी पिछड़े अंचल जहाँ से नई कविता जेसी साहित्य विधा के चर्चित महान साहित्य साधक डॉ रामशंकर चंचल ने इतिहास रचा है आज सैकड़ों हस्तियों द्वारा सराहा गया और गर्व महसूस होता है उन्हें बधाईयां दी जा रही है




