
सभी को लगाया रंग, सिर्फ तुम्हें छोड़कर,
कहाँ चले गए माँ-पापा, यूँ मुँह मोड़कर।।
सूना पड़ा आँगन है, चौखट भी रो पड़ी,
त्योहार आ गया फिर यादें सब जोड़कर।।
थाली में अब भी रखी है गुजिया तुम्हारे नाम,
बैठा हूँ देर तक मैं आँखें बिछाकर।।
भीतर सिसकती है होली बिना तुम्हारे आज,
कैसे लगाऊँ अबीर हँसी को निचोड़कर।।
भीगते रहे नैन चुपचाप रात भर,
तकिया भी सो गया है आँसू निचोड़कर।।
सबको गले लगाया, जग को हँसा दिया,
खुद रह गया अकेला दिल को ही तोड़कर।।
रंगों की भीड़ में क्यों इतना सूना हूँ,
ढूँढूँ तुम्हें गगन में पलकें ही जोड़कर।।
‘दिव्य’ पुकारता है हर साँस जोड़कर,
लौट आओ माँ-पापा, मुझको न छोड़कर।।
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




