
उसे पाया भी नहीं था ठीक से कि
भुलाने के दिन आ गये
उसे पाया भी नहीं था ठीक से कि
भुलाने के दिन आ गये
उसे जताया भी नहीं था ठीक से कि
खुद को समझाने के दिन आ गये
उसे सताया भी नहीं था ठीक से कि
खुद को सत्ता हुआ देखने के दिन आ गये
उसे तराशा भी नहीं था ठीक से कि
खुद के मुँह मोड़ लेने के दिन आ गये
आज क्या कहूँ कह के इतना कह गई
पर जो कहना था वो कह न सकी
छोड़ दी है आशा अब तुझको पाने की
अब समझ गई हूँ तू ना होके भी मेरा है
तेरे दिल में भले कोई भी आये
तुझे कोई भी अपना बनाये
ये सच है कि तू ना होगा मेरा
ये सच है कि तू ना होगा मेरा
जानती हूँ
तुझसे जुदा होने पर ना जी पाऊँगी न ही मर पाऊँगी
फिर भी एक ख्वाहिश है जब भी आये मौत मेरी
तू खड़ा हो सामने मेरे
तेरी आँखों में आँखें डाल कर
कहना चाहूँगी
पर ना कह कर मर जाऊँगी……
— रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (मध्य प्रदेश)




