
जिंदगी की भागदौड़ में,
कैसी सुबह कैसी होती है शाम?
मशीन की तरह भागती रहती हूं,
मिलता नहीं कुछ पलों का आराम।
सांसे बेचैन सी रहती है,
मन भी करता है यही पुकार।
सब जिम्मेदारियों के साथ-साथ,
खुद से भी कर लो प्यार।
मन चाहता है कभी मेरा,
एक कप चाय के साथ वक्त बिताऊं।
बीते लम्हों को याद कर,
आंखों में नए ख्वाब सजाऊ।
कुछ पलों का आराम मुझे,
सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।
मन फिर नयी उमंग जोश के साथ,
समस्याओं को सुलझा देता है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र




