
फूट रही बनकर किरण, कवि के मन में भाव ।
काव्य रूप में ढाल कर ,भर देते हर घाव।।
कविता की हर बात निराली।
सुनकर श्रोता देते ताली।।
शब्द- शब्द मन को छू लेती।
तन में ऊर्जा भर देते।।
फूलों के संग काव्य महके ।
सूरज की किरणों में दमके।।
बहती गंगा की धारा में।
गूंँजे जन-जन के नारा में ।।
रणक्षेत्र में ओज बढ़ाए।
अज्ञानी को शिर्ष चढ़ाए।।
प्रेम डोर बनकर मन जोड़े।
भटके लोगों का पथ मोड़े।
लोरी बनकर स्वप्न दिखाए।
रोम-रोम पुलकित कर जाए।
युग -युग की ये कहती गाथा ।
सुनकर विद्वत टेके माथा।।
है जन्मी अंतर्नाद से ,धूप छांँव के संग।
पलती पन्नों में सदा, सजी स्याह के रंग।।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’
जमशेदपुर




